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PSLV‑C62 से DRDO का ‘अन्वेषा’ लॉन्च, तीसरे चरण में आई गड़बड़ी; 600 किमी से दुश्मन बंकरों पर रखेगा निगाह

इसरो का साल 2026 का पहला स्पेस मिशन PSLV-C62 फिलहाल तकनीकी गड़बड़ी की वजह से जांच के घेरे में है, लेकिन इससे DRDO के हाईटेक हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट अन्वेषा (EOS-N1) की अहमियत कम नहीं होती। यह सैटेलाइट 600 किमी की ऊंचाई से दुश्मन के बंकरों और छिपे ठिकानों तक की हाई-डिटेल तस्वीरें लेने की क्षमता रखती है, हालांकि अभी इसे अपनी तय कक्षा में भरोसेमंद तरह से पहुंचाने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

PSLV‑C62 मिशन में क्या हुआ?

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PSLV‑C62, पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) का 64वां मिशन और 2026 का पहला लॉन्च प्रयास था।

  • रॉकेट ने 12 जनवरी 2026 को सुबह करीब 10:17–10:18 बजे श्रीहरिकोटा के सतिश धवन स्पेस सेंटर के फर्स्ट लॉन्च पैड से उड़ान भरी।

  • मिशन का लक्ष्य EOS‑N1 (अन्वेषा) के साथ कुल 15 उपग्रहों को लगभग 500–600 किमी की सन-सिंक्रोनस कक्षा में स्थापित करना था।

  • इसरो प्रमुख वी. नारायणन के अनुसार, तीसरे चरण (PS3) के अंत तक वाहन का प्रदर्शन सामान्य रहा, लेकिन इसके बाद रॉकेट के रोल रेट में गड़बड़ी और फ्लाइट पाथ में डेविएशन दर्ज हुआ, जिसे एजेंसी ने “anomaly” बताया है।

इसरो ने आधिकारिक बयान में कहा है कि PS3 स्टेज के अंत में PSLV‑C62 मिशन में गड़बड़ी दर्ज हुई है और विस्तृत तकनीकी विश्लेषण शुरू कर दिया गया है। इसका मतलब यह है कि अभी मिशन की अंतिम स्थिति और सभी सैटेलाइट्स की सही कक्षा में स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट आनी बाकी है।

अन्वेषा (EOS‑N1) क्या है?

EOS‑N1, जिसे अन्वेषा भी कहा जा रहा है, DRDO द्वारा विकसित एक उन्नत हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट है।

  • वज़न: लगभग 100–150 किलोग्राम की मिनी-सैटेलाइट श्रेणी में।

  • कक्षा: करीब 600 किमी ऊंचाई वाली लो अर्थ/सन-सिंक्रोनस कक्षा में ऑपरेट करने के लिए डिज़ाइन।

  • टेक्नॉलजी: यह पारंपरिक RGB (रेड‑ग्रीन‑ब्लू) इमेजिंग की तुलना में दर्जनों–सैकड़ों संकीर्ण स्पेक्ट्रल बैंड में डेटा कैप्चर करने वाली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग प्रणाली से लैस है, जिससे किसी वस्तु, मिट्टी, वनस्पति या संरचना की सामग्री (material) को स्पेक्ट्रल सिग्नेचर से पहचाना जा सकता है।

Lt Gen (सेवानिवृत्त) A.K. भात, इंडियन स्पेस एसोसिएशन (ISpA) के DG के अनुसार, अन्वेषा की मुख्य उपयोगिता तीन स्तरों पर है:

  • रणनीतिक–रक्षा उपयोग:

    • बंकरों, छिपे ठिकानों, मिसाइल साइट्स, छद्मावरण (camouflage) व भूमिगत संरचनाओं की पहचान।

    • रक्षा निगरानी (strategic surveillance) और मिसाइल डिफेंस से जुड़े लक्ष्यों की मॉनिटरिंग।

  • सिविल उपयोग:

    • कृषि में फसल स्वास्थ्य, नमी, पोषक स्थिति और रोगों की शुरुआती पहचान।

    • शहरी मैपिंग, लैंड यूज/लैंड कवर मॉनिटरिंग और पर्यावरणीय प्रदूषण/खनन जैसी गतिविधियों पर निगरानी।

  • मटेरियल आइडेंटिफिकेशन:

    • अलग-अलग खनिज, मेटल, केमिकल्स या विस्फोटक पदार्थों की पहचान में मदद, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण है।

इसी हाई-रिज़ॉल्यूशन स्पेक्ट्रल क्षमता की वजह से कहा जा रहा है कि 600 किमी की ऊंचाई से भी यह सैटेलाइट दुश्मन के बंकरों और छिपे ठिकानों की पहचान कर सकता है, जो सामान्य ऑप्टिकल सैटेलाइट्स से मुश्किल होता है।

इसरो–DRDO की भूमिका और रणनीतिक महत्व

यह मिशन इसरो और DRDO के बीच समन्वित काम का उदाहरण है।

  • इसरो: लॉन्च व्हीकल PSLV‑C62, मिशन डिजाइन, कक्षा में स्थापित करने की जिम्मेदारी।

  • DRDO: अन्वेषा का निर्माण, पेलोड इमेजिंग सिस्टम और डिफेंस–सिविल डुअल‑यूज़ एप्लिकेशन।

  • इंडियन स्पेस एसोसिएशन और प्राइवेट इंडस्ट्री (जैसे Centum Electronics) ने पेलोड इलेक्ट्रॉनिक्स व अन्य सिस्टम में योगदान दिया है।

रणनीतिक रूप से देखा जाए तो, अन्वेषा भारत की स्पेस‑आधारित इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) क्षमता को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है—खासकर कठिन, पहाड़ी या सीमा क्षेत्रों में जहां ग्राउंड या ड्रोन सर्विलांस सीमित होता है।

 अब आगे क्या?

फिलहाल प्राथमिकता PSLV‑C62 के थर्ड स्टेज एनॉमली की जांच पर है।

  • इसरो इंजीनियरिंग टीमें टेलीमेट्री डेटा, फ्लाइट पाथ और रोल रेट डिस्टर्बेंस का विश्लेषण कर रही हैं, ताकि यह पता चल सके कि गड़बड़ी सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, कंट्रोल सिस्टम या किसी अप्रत्याशित डायनेमिक इफेक्ट से हुई।

  • आने वाले दिनों में इसरो मिशन स्टेटस और अन्वेषा सहित सभी पेलोड्स की कक्षा/ऑपरेशनल स्थिति पर विस्तृत अपडेट जारी करेगा।

जब तक आधिकारिक फाइनल रिपोर्ट नहीं आ जाती, मिशन को “आंशिक सफलता” या “असफलता” की श्रेणी में रखने को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।

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