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India Iran Trade: क्या महंगे हो जाएंगे बादाम और खजूर? भारत के करोड़ों का व्यापार दांव पर

India Iran Trade: पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। साल 2026 के इस दौर में युद्ध के बादल जितने गहरे हो रहे हैं, भारत की भूमिका उतनी ही अहम होती जा रही है। भारत के लिए यह स्थिति किसी ‘धार्मिक संकट’ से कम नहीं है, क्योंकि हमारे संबंध एक तरफ इजरायल और अमेरिका से प्रगाढ़ हैं, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ हमारे सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक जुड़ाव हैं। यदि यह तनाव पूर्ण युद्ध में तब्दील होता है, तो इसका सीधा असर भारत के विदेशी व्यापार और आम आदमी की थाली पर पड़ना तय है।

सूखे मेवे और खास सब्जियां

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ईरान से भारत आने वाले कुल आयात में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा खाद्य पदार्थों, विशेषकर सूखे मेवों (Dry Fruits) का है। कुल आयात में इनका योगदान लगभग 29% है। भारतीय बाजारों में मिलने वाले प्रीमियम बादाम, पिस्ता और खजूर का एक बड़ा हिस्सा ईरानी बागानों से ही आता है। इसके अतिरिक्त, ईरान से उच्च गुणवत्ता वाले सेब और कुछ विशेष प्रकार की सब्जियां भी भारतीय मंडियों तक पहुँचती हैं। भारत के त्योहारों और रोजमर्रा की डाइट में ईरानी ड्राई फ्रूट्स का एक विशाल बाजार मौजूद है, जिसे युद्ध की स्थिति में आपूर्ति बाधित होने का डर सता रहा है।

व्यापारिक आंकड़े

आर्थिक समीकरणों की बात करें तो वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान भारत और ईरान के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.68 अरब डॉलर का रहा है। इस व्यापार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें निर्यात के मामले में भारत का पलड़ा भारी रहा है। भारत ने ईरान को 1.24 अरब डॉलर का सामान भेजा, जबकि वहां से 0.44 अरब डॉलर का सामान मंगवाया। हालांकि, ‘यूएन कॉमट्रेड’ (UN COMTRADE) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में आयात का आंकड़ा बढ़कर 1.06 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। यह वृद्धि दर्शाती है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापारिक निर्भरता बढ़ रही है।

प्रतिबंधों की काट

ईरान पर अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण डॉलर में वैश्विक लेनदेन करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में भारत और ईरान ने अपने व्यापार को सुरक्षित रखने के लिए ‘रुपया-रियाल पेमेंट मैकेनिज्म’ विकसित किया है। इस विशेष व्यवस्था के तहत दोनों देश अपनी स्थानीय करेंसी में लेनदेन करते हैं। इससे न केवल भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत होती है, बल्कि वैश्विक तनाव और प्रतिबंधों के बीच भी दोनों देशों का कारोबार बिना किसी बड़ी रुकावट के चलता रहता है। जानकारों का मानना है कि युद्ध छिड़ने पर यह भुगतान प्रणाली भारत के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी।

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