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जिस पिता ने पसीना बहाकर बच्चों को किया बड़ा , मौत पर भी नहीं आए बेटे-बेटियां, संपत्ति के लिए भूले रिश्ते

Viral News: भोपाल से सामने आई एक बुजुर्ग पिता की कहानी दिल को झकझोर देने वाली है। घनश्याम राजपूत ने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत करके अपने चार बच्चों की परवरिश की। पंचर और टायर-ट्यूब का काम करके उन्होंने परिवार का पेट पाला और बच्चों को बड़ा किया। उन्हें उम्मीद थी कि बुढ़ापे में यही बच्चे उनका सहारा बनेंगे।

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लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उनकी यह उम्मीद टूट गई। करीब एक साल पहले उनके बच्चे उन्हें इंदौर के बस स्टैंड पर बेसहारा छोड़ गए। इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से घनश्याम को भोपाल के आनंद धाम वृद्धाश्रम पहुंचाया गया।

तीन साल से वृद्धाश्रम में रह रहे थे घनश्याम

जानकारी के मुताबिक, घनश्याम राजपूत करीब तीन वर्षों से आनंद धाम वृद्धाश्रम में रह रहे थे। वहां रहने के दौरान भी उन्हें अपने बच्चों के आने का इंतजार रहता था। वृद्धाश्रम में मौजूद दूसरे बुजुर्गों के मुताबिक, घनश्याम अक्सर अपने बच्चों को याद करते थे और उनके मिलने की उम्मीद लगाए बैठे रहते थे।

लेकिन उनका यह इंतजार कभी खत्म नहीं हुआ। 4 अगस्त को घनश्याम की मौत हो गई। इसके बाद परिवार से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी अंतिम विदाई में परिवार का कोई सदस्य नहीं पहुंचा।

संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया तो क्यों आएं?’

इस मामले में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात बच्चों की कथित प्रतिक्रिया बताई जा रही है। खबर के मुताबिक, बच्चों ने कहा कि जब पिता ने संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया तो वे क्यों आएं। इस जवाब ने माता-पिता और बच्चों के रिश्ते को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जिस पिता ने अपनी मेहनत की कमाई बच्चों की जिंदगी संवारने में लगा दी, उसी पिता को आखिरी समय में अपनों का साथ तक नहीं मिल पाया।

वृद्धाश्रम संचालिका ने बताई एक और कड़वी सच्चाई

आनंद धाम वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा के अनुसार, कई बार बुजुर्ग की मौत के बाद संपत्ति या दूसरे दस्तावेजों से जुड़े काम के लिए परिवार के लोग संपर्क करते हैं। ऐसे मामले यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या माता-पिता का रिश्ता सिर्फ जमीन-जायदाद तक सीमित रह गया है?

बढ़ते वृद्धाश्रम समाज के लिए सवाल

घनश्याम की कहानी केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी छोड़ती है। माता-पिता अपनी जिंदगी बच्चों को बेहतर भविष्य देने में लगा देते हैं, लेकिन क्या बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ संपत्ति के आधार पर याद किया जाना चाहिए?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पहले कह चुके हैं कि घरों का सूना होना और वृद्धाश्रमों का बढ़ना चिंता की बात है। घनश्याम की कहानी बताती है कि बुजुर्गों को आर्थिक मदद के साथ-साथ अपनापन और सम्मान भी उतना ही जरूरी है।

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