SIR Election Controversy: बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। SIR यानी Special Intensive Revision के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच कुछ विपक्षी नेताओं की ओर से संबंधित चुनावों को दोबारा कराने की मांग सामने आई है। हालांकि, किसी राजनीतिक मांग से अपने आप चुनाव रद्द या दोबारा नहीं होते।
SIR को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?
Special Intensive Revision का उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करना है। चुनाव आयोग के मुताबिक SIR के तहत मतदाताओं की जानकारी की जांच की जाती है और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने तथा अपात्र प्रविष्टियों को हटाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। आयोग ने इसके लिए अपने पोर्टल पर SIR से जुड़ी मतदाता सूची और नाम खोजने की सुविधा भी उपलब्ध कराई है।
बिहार में SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग ने बताया था कि अंतिम सूची में करीब 7.42 करोड़ मतदाता शामिल थे। आयोग के अनुसार ड्राफ्ट सूची से हटाए गए नामों और नए जोड़े गए मतदाताओं को लेकर आपत्ति और अपील की व्यवस्था भी मौजूद है।
किन राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग?
बिहार और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची तथा चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए हैं। महाराष्ट्र में भी विपक्ष की ओर से चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाकर नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की गई है। दिल्ली और हरियाणा में पुराने चुनावों से जुड़े मतदाता सूची संबंधी आरोपों का भी राजनीतिक बहस में उल्लेख हो रहा है।
हालांकि, अलग-अलग राज्यों में लगाए गए आरोपों की प्रकृति एक जैसी नहीं है। किसी आरोप या राजनीतिक दावे से चुनाव में अनियमितता कानूनी तौर पर साबित नहीं मानी जाती।
क्या पूरे राज्य में दोबारा चुनाव कराया जा सकता है?
Representation of the People Act, 1951 के तहत चुनाव को चुनौती देने के लिए कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है। धारा 100 में हाई कोर्ट द्वारा किसी निर्वाचित उम्मीदवार का चुनाव शून्य घोषित किए जाने के आधार बताए गए हैं। इनमें भ्रष्ट आचरण, गलत तरीके से वोट स्वीकार या खारिज करना और ऐसी कानूनी अनियमितता शामिल है जिससे संबंधित उम्मीदवार के चुनाव परिणाम पर महत्वपूर्ण असर पड़ा हो।
इसका मतलब यह है कि किसी राज्य में दोबारा चुनाव कराने का फैसला केवल राजनीतिक मांग के आधार पर नहीं होता। इसके लिए संबंधित चुनाव और कानूनी प्रक्रिया के तहत ठोस आधार और सक्षम प्राधिकारी का फैसला जरूरी होता है।
आगे क्या होगा?
मतदाता सूची से जुड़े विवादों में आपत्ति और अपील के लिए भी कानूनी व्यवस्था है। चुनाव आयोग के अनुसार अंतिम मतदाता सूची में किसी प्रविष्टि से असंतुष्ट व्यक्ति संबंधित प्रावधानों के तहत अपील कर सकता है।
इसलिए फिलहाल पांच राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग को राजनीतिक मांग के तौर पर देखा जा रहा है, न कि घोषित पुनर्मतदान के तौर पर। SIR से जुड़े दावे, चुनावी रिकॉर्ड और अदालतों में चल रही प्रक्रियाएं आगे की स्थिति तय करने में महत्वपूर्ण होंगी।
