Indore News: इंदौर से रिश्तों को झकझोर देने वाला एक मामला सामने आया है। यहां एक बुजुर्ग महिला की मौत के बाद उनके चारों बेटे अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंचे। बताया जा रहा है कि अस्पताल में तीन दिन तक महिला का शव रखा रहा, लेकिन परिवार की ओर से कोई आगे नहीं आया। आखिरकार समाजसेवियों और वृद्धाश्रम से जुड़े लोगों ने आगे बढ़कर बेटे का फर्ज निभाया और बुजुर्ग महिला का अंतिम संस्कार किया।
इलाज के दौरान हुई लता बाई की मौत
रिपोर्ट के मुताबिक लता बाई इंदौर के सिलिकॉन सिटी इलाके की गणेश रेसिडेंसी में रहती थीं। 13 सितंबर को तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। महिला की मौत की जानकारी उनके चारों बेटों को दी गई, लेकिन कोई भी अस्पताल पहुंचकर शव लेने या अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाने नहीं आया।
तीन दिन तक शव के अंतिम संस्कार का इंतजार किया गया। परिवार और समाजसेवियों की ओर से बेटों से मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अपील भी की गई, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार कोई बेटा नहीं पहुंचा।
जिंदगीभर की कमाई से खरीदा था फ्लैट
बताया जा रहा है कि लता बाई ने अपनी जिंदगीभर की बचत और जेवर बेचकर गणेश रेसिडेंसी में फ्लैट खरीदा था। आरोप है कि बाद में यह फ्लैट उनके बेटों ने अपने नाम करवा लिया और बुजुर्ग महिला को घर से बाहर कर दिया।
घर से निकलने के बाद लता बाई को कुछ समय सड़क पर भी गुजारना पड़ा। इसी दौरान समाजसेवी अजय नागदा और प्रीयु फाउंडेशन के सदस्यों की नजर उन पर पड़ी।
वृद्धाश्रम में मिला सहारा
समाजसेवियों ने लता बाई का मेडिकल चेकअप कराया और उनके रहने की व्यवस्था जानकी वृद्धाश्रम में कराई। वह करीब आठ महीने तक वृद्धाश्रम में रहीं। इस दौरान संस्था से जुड़े लोगों ने उनकी देखभाल की।बाद में तबीयत बिगड़ने पर उन्हें एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 13 सितंबर को उन्होंने दम तोड़ दिया।
समाजसेवियों ने निभाया अंतिम फर्ज
मौत के बाद बेटों से संपर्क किया गया और उनसे अंतिम संस्कार में आने की अपील की गई। लेकिन तीन दिन के इंतजार के बाद भी परिवार की ओर से कोई नहीं पहुंचा। जरूरी कानूनी प्रक्रिया और पोस्टमार्टम पूरा होने के बाद जानकी वृद्धाश्रम और प्रीयु फाउंडेशन के सदस्य आगे आए।
बुधवार को इंदौर के रीजनल पार्क मुक्तिधाम में लता बाई का हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया गया। जिन लोगों ने उनके जीवन के आखिरी महीनों में उनका साथ दिया, उन्हीं लोगों ने उनके अंतिम सफर की जिम्मेदारी भी उठाई।
