Trending News: भारत की न्याय व्यवस्था में अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि अदालतों में मामलों का फैसला आने में कई साल लग जाते हैं। इसी वजह से “जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड” यानी न्याय में देरी, न्याय से वंचित होने के बराबर माना जाता है। ऐसे मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं।
हाल ही में पेपर लीक के मामलों पर सख्त कार्रवाई की बात करते हुए सरकार ने दोषियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई कराने की घोषणा की है। ऐसे में आइए आसान भाषा में समझते हैं कि फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होता है और यह सामान्य अदालत से कैसे अलग है।
क्या होता है फास्ट ट्रैक कोर्ट?
फास्ट ट्रैक कोर्ट विशेष अदालतें होती हैं, जिनका उद्देश्य गंभीर, संवेदनशील और लंबे समय से लंबित मामलों की तेजी से सुनवाई करना होता है। इन अदालतों में मामलों की सुनवाई लगातार होती है ताकि पीड़ित को जल्द न्याय मिल सके और अदालतों पर बढ़ते बोझ को भी कम किया जा सके।इन अदालतों में केवल वही मामले भेजे जाते हैं, जिन्हें सरकार या न्यायपालिका विशेष प्राथमिकता देती है।
कब हुई थी शुरुआत?
भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत वर्ष 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद हुई थी। बाद में 2012 के निर्भया कांड के बाद महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों की तेजी से सुनवाई की मांग बढ़ी। इसके बाद रेप और POCSO मामलों के लिए विशेष फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) की व्यवस्था शुरू की गई।
सामान्य अदालत से कैसे अलग है?
फास्ट ट्रैक कोर्ट और सामान्य अदालत के बीच सबसे बड़ा अंतर सुनवाई की गति का होता है।सामान्य अदालतों में मामलों की संख्या अधिक होने के कारण तारीखों के बीच लंबा अंतर हो सकता है। वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट में रोजाना या लगातार सुनवाई की जाती है और बिना ठोस कारण के तारीख आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जाती।सामान्य अदालतें हर प्रकार के दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई करती हैं, जबकि फास्ट ट्रैक कोर्ट मुख्य रूप से रेप, POCSO, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, आतंकवाद तथा अन्य गंभीर मामलों पर ध्यान देती हैं।
किन मामलों में बना मिसाल?
देश के कई चर्चित मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने तेजी से फैसला सुनाकर मिसाल पेश की है।निर्भया गैंगरेप केस (2012) में त्वरित सुनवाई के बाद दोषियों को सजा सुनाई गई।26/11 मुंबई आतंकी हमला मामले में विशेष व्यवस्था के तहत सुनवाई कर दोषी अजमल कसाब को जल्द सजा दी गई।कई राज्यों में POCSO मामलों में 14 से 30 दिनों के भीतर सुनवाई पूरी कर दोषियों को कड़ी सजा सुनाई जा चुकी है।
क्या सिर्फ फास्ट ट्रैक कोर्ट ही समाधान है?
विशेषज्ञों का मानना है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट न्याय प्रक्रिया को तेज जरूर बनाते हैं, लेकिन केवल अदालतों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। समय पर जांच, आधुनिक फॉरेंसिक सुविधाएं, पर्याप्त जजों की नियुक्ति और मजबूत पुलिस जांच भी उतनी ही जरूरी है। तभी त्वरित न्याय के साथ निष्पक्ष न्याय भी सुनिश्चित किया जा सकता है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट आज भारतीय न्याय व्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुके हैं। गंभीर अपराधों में पीड़ितों को जल्द राहत दिलाने और न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा मजबूत करने में इनकी भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है।
