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खून से राष्ट्रपति को चिट्ठी: “अंकिता को न्याय न मिला तो बेटियाँ सुरक्षित कैसे?”

उत्तराखंड के पहाड़ों से निकली दो सगी बहनों की खून से लिखी चिट्ठी ने न सिर्फ राज्य की सरकार को आईना दिखाया है, बल्कि पूरे देश को बेटियों की सुरक्षा पर सवाल करने को मजबूर कर दिया है। कक्षा 10 की छात्रा संजना और उसकी बड़ी बहन कुसुम लता बौड़ाई ने राष्ट्रपति को अपने खून से पत्र लिखकर पूछा है—“जब एक बेटी को न्याय नहीं मिलता, तो बाकी बेटियाँ कैसे सुरक्षित?”  विधानसभा क्षेत्र (अल्मोड़ा) की ये बेटियाँ काशीपुर के तारावती बालिका विद्या मंदिर की छात्रा हैं। उनकी चिट्ठी अंकिता भंडारी हत्याकांड के चार साल बाद भी लटकी न्यायिक प्रक्रिया का आक्रोश है।

खून से चिट्ठी: हताशा का चरम

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संजना और कुसुम की यह चिट्ठी कोई नाटकीय प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा का प्रतीक है। अंकिता भंडारी—उत्तराखंड के ऋषिकेश में एक रिसॉर्ट में काम करने वाली 19 वर्षीय बेटी—की 2022 में हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। पूर्व मंत्री के बेटे सहित तीन आरोपी अभी भी जमानत पर बाहर हैं, चार्जशीट पर सवाल हैं, और CBI जांच के बावजूद न्याय अधर में लटका है। बहनों का सवाल स्पष्ट है: अगर सत्ता से जुड़े अपराधी बच जाएँगे, तो आम बेटी का क्या होगा? काशीपुर से अल्मोड़ा होते हुए राष्ट्रपति भवन तक पहुँची यह चिट्ठी पहाड़ी बेटियों की त्रासदी को उजागर करती है—जहाँ शिक्षा के नाम पर हॉस्टल भेजी जाती हैं, लेकिन न्याय के लिए खून बहाना पड़ता है।

अंकिता केस: सत्ता का काला अध्याय

अंकिता का कत्ल कोई साधारण हत्या नहीं था। यह रिसॉर्ट संस्कृति, सत्ता के दुरुपयोग और बेटियों की असुरक्षा का प्रतीक बन गया। पूर्व मंत्री पुलकित आर्य के बेटे विनीत आर्य सहित आरोपी जमानत पर खुले घूम रहे हैं। CBI को सौंपी जांच में साक्ष्य छेड़छाड़ के आरोप लगे। मुख्यमंत्री धामी ने इसे “हृदय विदारक” कहा, लेकिन कार्रवाई रुकी हुई है। क्या बेटी की जान मंत्री-पुत्र के लिए इतनी सस्ती है? दो बहनों की चिट्ठी यही चीख रही है—न्याय दो, वरना बेटियाँ खून से लिखेंगी इतिहास।

सत्ता से सीधे सवाल: व्यवस्था बहरी क्यों?

राष्ट्रपति महोदया, जब पहाड़ की बेटी अंकिता को न्याय नहीं मिला, तो संजना-कुसुम जैसी बेटियाँ खून क्यों बहाएँ? उत्तराखंड सरकार ने “बेटी बचाओ” के नारे तो लगाए, लेकिन अंकिता केस में लापरवाही क्यों? जमानत क्यों मिली? CBI रिपोर्ट क्यों दबाई जा रही? क्या सत्ता का दबाव न्याय को कुचल रहा है? अगर खून से पत्र लिखना पड़े, तो “नारी शक्ति” का नारा झूठा तो नहीं?

यह चिट्ठी समाज को भी झकझोरती है। क्या हम बेटियों की पीड़ा को केवल सोशल मीडिया तक सीमित रखेंगे? समय है—सत्ता जागे, न्याय हो।

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