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Mallikarjun Kharge VS Nitish Kumar: PM फेस के लिए कौन किस पर भारी ! PM Modi को कौन दे सकता है चुनौती !

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विपक्षी गठबंधन में पीएम फेस के लिए पहले सिर्फ एक ही नाम की चर्चा थी इंडिया गठबंधन की चौथी बैठक के बाद दो नामों पर चर्चा होने लगी है। हलांकि ‘इंडिया’ गठबंधन ने किसी नेता को आधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया गया। लेकिन आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने कहा “ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम को प्रस्तावित किया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस नाम का समर्थन किया”

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अब सवाल है कि इन दोनों चेहरों में से प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती कौन दे सकता है। क्या खड़गे राजनीतिक रुप से नीतीश से ज्यादा कुशल हैं?

मल्लिकार्जुन खड़गे का 55 साल से अधिक का राजनीतिक करियर

खड़गे ने पिछले आठ-नौ साल में पूरी राजनीति दिल्ली में की है, वो कर्नाटक में सक्रिय नहीं हैं। खड़गे 2014 के बाद लोकसभा में पार्टी के नेता थे और अभी राज्यसभा में कांग्रेस के नेता हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे का 55 साल से अधिक का राजनीतिक करियर रहा है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने राजनीतिक करियर शुरुआत गुलबर्गा में यूनियन छात्र संघ के महासचिव के रूप में की थी। इसके बाद वो लगातार आगे बढ़ते रहे। वो पहली बार 1969 में गुलबर्गा शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने थे। 1972 में चुनाव लड़कर पहली बार विधायक बने और फिर मंत्री उसके बाद कई दशक तक हार का मुंह नहीं देखा। उसके बाद से वो अब तक नौ बार विधायक और दो बार सांसद रहे हैं। पहली बार 2009 में लोकसभा का चुनाव लड़ा, जीत हासिल कर सांसद भवन पहुंचे। 9 बार विधायक रहने वाले खड़गे कर्नाटक में लगातार मंत्री पद पर भी रहे। पहली बार 1976 में उन्हें प्राथमिक शिक्षा राज्य मंत्री नियुक्त किया गया था। अपने लंबे राजनीतिक सफ़र में उन्हें सिर्फ़ एक ही बार हार मिली, जब वो 2019 का लोकसभा चुनाव हार गए थे।

21 जुलाई 1942 को जन्मे मल्लिकार्जुन खड़गे राजनीति में आने से पहले वकालत के पेशे में थे। उनका जन्म कर्नाटक में गरीब परिवार में हुआ था और उन्होंने स्नातक और वकालत की पढ़ाई की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि खड़गे का नाम आगे करके विपक्ष दलित कार्ड खेलने की कोशिश कर रहा है। भारत में आबादी का जातिगत आंकड़ा नहीं है, हालांकि अनुमानों के मुताबिक भारत में क़रीब 25 फीसदी दलित हैं। भारतीय राजनीति इतिहास में कोई दलित प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंचा है।

2005 के बाद नीतीश कुमार ने नहीं लड़ा है कोई चुनाव

1 मार्च 1951 को जन्मे नीतीश अब तक 8 बार सीएम पद की शपथ ले चुके हैं। जेपी आंदोलन से राजनीति के अखाड़े में कूदने वाले CM नीतीश कुमार ने पहली बार जनता पार्टी के टिकट पर हरनौत सीट से 1977 में चुनाव लड़ा और हार गए। 1985 में हरनौत से नीतीश कुमार ने जीत दर्ज की और पहली बार विधायक बने।1989 में नीतीश कुमार पहली बार बाढ़ से सांसद बने। इसके 3 साल बाद ही 1991 में दोबारा नीतीश कुमार बाढ़ से सांसद चुने गए। नीतीश इसके बाद 1996 और 1998 में भी सांसद बने।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 1998 में नीतीश कुमार को केंद्रीय रेल मंत्री बनाया गया। हालांकि किशनगंज के पास हुए भीषण रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था। 1999 में नीतीश कुमार 5वीं बार सासंद का चुनाव जीते. इस बार उन्हें केंद्र सरकार ने कृषि मंत्री बनाया। 2004 में छठी और आखिरी बार नीतीश कुमार सांसद बने। उसके बाद नीतीश कुमार, बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे और आज तक वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं। 2014 में उन्होंने अपनी मर्जी इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को कुछ दिन के लिए मुख्यमंत्री बनाया फिर सत्ता पर काबिज हो गए। पिछले 18 सालों से वो सीएम पद पर बने हुए हैं।

नीतीश कुमार 1 बार विधायक और 6 बार सांसद चुने गए हैं। 2005 में अखिरी चुनाव लड़ा था। उसके बाद से वो खुद चुनाव नहीं लड़ते लेकिन चुनाव प्रचार जरुर करते हैं। 2005 के बाद से ही वो MLC बनकर CM की कुर्सी पर बने हुए हैं।

राजनीति साधने में माहिर हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

खड़गे का राजनीतिक अनुभव ज्यादा है लेकिन नीतीश को राजनीति साधने का अनुभव ज्यादा है। 9 बार विधायक बन खड़गे ने कार्नटक राज्य का मंत्रालय जरुर देखा है लेकिन नीतीश 18 साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। खड़गे शुरु से ही कांग्रेस के साथ रहे। नीतीश ने अपने राजनीतिक जीवन में कई पार्टियां बदली, जॉर्ज फ़र्नान्डिस के साथ मिलकर JDU बनाई और अपनी पार्टी को राज्य में शिखर तक पहुंचाया भी। खरगे अभी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं लेकिन पार्टी को जीवित नहीं कर पा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती देने के लिए जब किसी को कोई फर्मूला नहीं सूझ रहा था तब CM नीतीश कुमार ने INDIA गठबंधन की पूरी पटकथा लिख दी। सत्ता में बने रहने के लिए CM नीतीश ने वो कर दिया जो भारतीय राजनीतिक इतिहास में किसी पार्टी ने तब तक नहीं किया था। 2014 में अपने धुर विरोधी लालू यादव से हाथ मिलाकर BJP को बिहार की सत्ता से बाहर कर दिया था। कभी BJP तो कभी RJD को साथ लेकर नीतीश सत्ता में बने हैं। ये राजनीति को साधने की तरकीब कहें या खालिस राजनीति।

जातीय राजनीति के हिसाब से देखें तो ”मल्लिकार्जुन खड़गे दलित नेता हैं और PM मोदी एनडीए की तरफ से ओबीसी चेहरा हैं। नीतीश कुमार भी ओबीसी सुमदाय से आते हैं। शायद इसलिए इंडिया गठबंधन ने एक दलित चेहरे को आगे बढ़ाया है। क्योंकि अभी तक भारत में कोई दलित प्रधानमंत्री नहीं बना है। अगर मल्लिकार्जुन खड़गे को PM उम्मीदवार घोषित कर इंडिया गठबंधन चुनाव जीत जाती है तो एक इतिहास जरुर बनेगा।

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