Supreme Court ने गृहिणियों की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि उन्हें केवल ‘होममेकर’ नहीं बल्कि ‘नेशन बिल्डर’ यानी राष्ट्र निर्माता के रूप में देखा जाना चाहिए। अदालत ने माना कि घर और परिवार की देखभाल में गृहिणियों का योगदान अमूल्य है और इसका आर्थिक मूल्य भी निर्धारित किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि गृहिणियों के घरेलू कार्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने मुआवजे की गणना के लिए गृहिणी की काल्पनिक मासिक आय 30 हजार रुपये मानने का निर्देश दिया।
2001 के सड़क हादसे से जुड़े मामले में आया फैसला
यह टिप्पणी नवंबर 2001 में हरियाणा में हुई एक सड़क दुर्घटना के मामले की सुनवाई के दौरान की गई। इस दुर्घटना में एक गृहिणी की मौत हो गई थी। मामला मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) से जुड़ा था, जहां अक्सर गृहिणियों के घरेलू योगदान का आर्थिक मूल्यांकन करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस कोटिस्वर सिंह की पीठ ने इस मुद्दे पर विस्तृत टिप्पणी करते हुए गृहिणियों के योगदान को कानूनी मान्यता देने पर जोर दिया।
‘गृहिणियां राष्ट्र निर्माण में निभाती हैं अहम भूमिका’
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गृहिणियां केवल घर संभालने का काम नहीं करतीं, बल्कि वे परिवार की नींव को मजबूत बनाती हैं और आने वाली पीढ़ियों का निर्माण करती हैं।
पीठ ने कहा, “घरेलू महिलाएं राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे समाज और देश के भविष्य को आकार देती हैं। ऐसे योगदान का मूल्य केवल घरेलू कार्यों तक सीमित नहीं माना जा सकता।”
महिलाएं करती हैं पुरुषों से कई गुना अधिक बिना वेतन वाला काम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि 15 से 59 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं प्रतिदिन सात घंटे से अधिक समय बिना वेतन वाले घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों में बिताती हैं, जबकि पुरुष औसतन तीन घंटे से भी कम समय ऐसे कार्यों में लगाते हैं।
अदालत ने कहा कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में लगभग 2.6 गुना अधिक बिना वेतन वाला घरेलू कार्य करती हैं। यह स्थिति तब भी बनी रहती है जब महिलाएं आर्थिक रूप से परिवार में योगदान दे रही हों।
मुआवजा तय करते समय इन बातों का रखा जाए ध्यान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहिणियों की आय का आकलन करते समय उनकी उम्र, शिक्षा, कौशल, पारिवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि सड़क दुर्घटना मुआवजा मामलों का निपटारा सामान्यतः एक वर्ष के भीतर हो जाना चाहिए। यदि पीड़ित परिवारों को वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़े, तो कानून का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
