मेरठ की पारंपरिक गुड़-तिल गजक को अब भौगोलिक संकेत चिह्न (GI टैग) मिल गया है। यह उपलब्धि 121 साल पुरानी इस मिठाई को वैश्विक पहचान दिलाएगी, स्थानीय कारीगरों को लाभ पहुँचाएगी और नकली उत्पादों से सुरक्षा देगी। मेरठ रेवड़ी गजक व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन के प्रयासों से दिसंबर 2025 में मिले इस टैग ने शहर की सांस्कृतिक धरोहर को मजबूती दी।
गजक की उत्पत्ति और विशेषता
मेरठ की गजक का आविष्कार करीब 150 साल पहले रामचंद्र सहाय ने किया था। गुड़ को पानी में उबालकर चिपचिपा बनाया जाता है, ठंडा होने पर तिल मिलाकर खींचा जाता है और विभिन्न आकारों में ढाला जाता है। यह प्रक्रिया दो दिन लेती है। सर्दियों में बनने वाली यह मिठाई लौंग, इलायची, जावित्री, जायफल से युक्त होती है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। गुजरी बाजार, बेगमपुल, गढ़ रोड, बुढ़ाना गेट में 500+ दुकानें हैं।
प्रति वर्ष 80 करोड़ रुपये का कारोबार, 18 देशों (कनाडा, अमेरिका, सऊदी अरब) में निर्यात। खस्ता, चॉकलेट, काजू पट्टी जैसे 50 प्रकार।
GI टैग का महत्व
GI टैग उत्पाद को उसके भौगोलिक मूल से जोड़ता है, नकल रोकता है। अब केवल मेरठ की गजक ही “मेरठ गजक” कहला सकेगी। खरीदारों को स्वाद, विधि और कहानी की जानकारी मिलेगी। मुरैना (मध्य प्रदेश) गजक को भी GI है, लेकिन मेरठ की अनूठी है।
उद्योग विभाग ने प्रस्ताव भेजा, हाई पावर कमेटी ने मंजूर किया। इससे ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी, निर्यात दोहरा होगा।
कारीगरों और अर्थव्यवस्था को लाभ
500+ कारीगर लाभान्वित होंगे। छोटे व्यापारियों को बाजार विस्तार, नौकरियां सृजित होंगी। GI टैग से प्रीमियम प्राइसिंग, ऑनलाइन/अंतरराष्ट्रीय बिक्री बढ़ेगी। मेरठ की अन्य GI चीजें (कैंची, बगल) के साथ गजक पहचान मजबूत करेगा। GI टैग मेरठ गजक को वैश्विक बनाएगा। सर्दियों का स्वाद अब संरक्षित धरोहर है।
