Pitru Paksha 2026: धर्म डेस्क, नई दिल्ली। 26 सितंबर 2026 से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में यह अवधि पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन दिनों तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। मान्यता के अनुसार, विधि-विधान और श्रद्धा से किए गए श्राद्ध से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पितृपक्ष में कैसा रखें खान-पान?
पितृपक्ष के दौरान सात्विक भोजन करने की परंपरा है। कई परिवारों में प्याज-लहसुन से परहेज किया जाता है और दाल, चावल, सब्जियां जैसे सादे भोजन को प्राथमिकता दी जाती है। मांस-मदिरा और अत्यधिक मसालेदार भोजन से बचने की मान्यता है। श्राद्ध के भोजन में तिल, जौ, दूध, घी और शहद का इस्तेमाल भी कई परंपराओं में किया जाता है।
हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में कुलाचार अलग हो सकते हैं। इसलिए श्राद्ध की विधि परिवार की परंपरा के अनुसार की जाती है।
श्राद्ध का समय और स्थान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म दोपहर के समय करना उचित माना जाता है। तर्पण में काले तिल और कुशा का इस्तेमाल किया जाता है। कई लोग अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार घर, तीर्थस्थल या पवित्र नदी के किनारे श्राद्ध करते हैं।
ब्राह्मण भोज और पंचबली की परंपरा
श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने और अपनी क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। इसके अलावा देवताओं, गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भोजन निकालने की परंपरा को पंचबली कहा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी विधि और मान्यताएं अलग हो सकती हैं।
पितृपक्ष में किन कामों से बचते हैं?
धार्मिक मान्यताओं में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध का समय माना गया है। इस दौरान कई परिवार विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों को टालते हैं। बाल, दाढ़ी और नाखून काटने को लेकर भी कुछ परंपराओं में परहेज किया जाता है। परिवार के लोग इस अवधि में संयम और सात्विक आचरण रखने का प्रयास करते हैं।
पूर्वजों की तस्वीर कहां रखें?
वास्तु संबंधी मान्यताओं के अनुसार पूर्वजों की तस्वीर दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखने की सलाह दी जाती है। हालांकि, यह धार्मिक अनिवार्यता नहीं है और अलग-अलग वास्तु परंपराओं में इसके नियम अलग बताए जाते हैं।
पितृपक्ष में क्या करना चाहिए?
पितरों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। कई परिवार रोजाना काले तिल और कुशा के जल से तर्पण करते हैं। जरूरतमंदों को भोजन कराने और अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र या दक्षिणा दान करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दौरान घर आए पशु-पक्षियों और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन देना पुण्यकारी माना जाता है।
