Hariyali Teej 2026: सावन मास में मनाई जाने वाली हरियाली तीज सुहागिन महिलाओं के प्रमुख पर्वों में से एक मानी जाती है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं तथा भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती हैं।
पहली हरियाली तीज मायके में मनाने की परंपरा
भारतीय परंपरा के अनुसार विवाह के बाद बेटी की पहली हरियाली तीज उसके मायके में मनाई जाती है। माना जाता है कि शादी के बाद बेटी अपने नए जीवन में सहज महसूस करे और मायके का स्नेह व आशीर्वाद उसे मिलता रहे, इसलिए परिवार उसे विशेष रूप से मायके बुलाता है।
इस अवसर पर बेटी को नए वस्त्र, श्रृंगार का सामान, मिठाइयां, घेवर और उपहार दिए जाते हैं। कई राज्यों में इस परंपरा को ‘सिंधारा’ या ‘सिंजारा’ कहा जाता है। यह केवल उपहार देने की रस्म नहीं, बल्कि बेटी के प्रति प्रेम, सम्मान और शुभकामनाओं का प्रतीक माना जाता है।
शिव-पार्वती से जुड़ी धार्मिक मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर हरियाली तीज के दिन भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी कारण यह पर्व वैवाहिक सुख, अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन की खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
राधा रानी की परंपरा से भी जुड़ा है संबंध
ब्रज क्षेत्र में हरियाली तीज का विशेष उत्सव मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन राधा रानी नंदगांव से अपने मायके बरसाना आती हैं और श्रीकृष्ण के साथ झूलन उत्सव का आनंद लेती हैं। इसी परंपरा के आधार पर नवविवाहित बेटियों की पहली हरियाली तीज मायके में मनाने की प्रथा प्रचलित हुई।
आज भी निभाई जाती है यह परंपरा
आज भी देश के कई हिस्सों में परिवार इस परंपरा को पूरे उत्साह के साथ निभाते हैं। पहली हरियाली तीज केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि बेटी और उसके मायके के बीच प्रेम, अपनापन और भावनात्मक रिश्ते को मजबूत करने का भी अवसर माना जाता है।
