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शिक्षा या व्यापार : 60 की किताब 500 मे पैरेंट्स बोले , बस अब बहुत हो गया

School Rising Book Prices: नए अकादमिक सेशन की शुरुआत के साथ ही एक बार फिर प्राइवेट स्कूलों की किताबों की कीमतों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। छोटी-छोटी कक्षाओं के बच्चों के लिए किताबें खरीदने पहुंचे माता-पिता तब हैरान रह गए जब उन्होंने बिल देखा। जो किताब बाजार में 60 रुपये की मिल सकती है, वही स्कूल के पैकेज में 400-500 रुपये तक में दी जा रही है।

NCERT किताबें कहां गायब हो गईं?

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अभिभावकों का कहना है कि अगर बच्चों को NCERT की किताबें पढ़ाई जाएं तो खर्च काफी कम हो सकता है। लेकिन ज्यादातर प्राइवेट स्कूल अब NCERT की बजाय प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें चलाते हैं। स्कूल खुद का बुक सेट तैयार कराते हैं, जिसमें किताबों के साथ कॉपियां, कवर और स्टेशनरी भी शामिल होती है। इससे माता-पिता को मजबूरी में वही पैकेज खरीदना पड़ता है।

5 हजार से 10 हजार तक का खर्च

कई स्कूलों में एक बच्चे की किताबों का पूरा सेट 5,000 से 10,000 रुपये तक पहुंच रहा है। इसमें ऐसी चीजें भी शामिल होती हैं जिनका इस्तेमाल शायद ही कभी होता है,जैसे हर साल नई एटलस या एक्टिविटी बुक्स। वहीं 20-30 रुपये की नोटबुक 80 रुपये तक में बेची जा रही है। पेंसिल, ब्रश और अन्य सामान की कीमत भी बाजार से कहीं ज्यादा होती है।

हाईकोर्ट के आदेश का क्या हुआ?

साल 2019 में दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि स्कूलों में NCERT की किताबों को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन कई स्कूल इस आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। हर साल नए नियम और नई लिस्ट जारी कर दी जाती है, जिससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।

मिडिल क्लास पर बढ़ता बोझ

माता-पिता कहते हैं कि बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्हें ये सब खर्च उठाना ही पड़ता है। लेकिन किताबों के साथ-साथ यूनिफॉर्म, बस फीस और अन्य खर्च जोड़ दें तो मिडिल क्लास परिवार का बजट पूरी तरह बिगड़ जाता है। कई अभिभावकों का यह भी मानना है कि अगर सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाया जाए, तो लोग प्राइवेट स्कूलों की ओर जाने से बचेंगे।

क्या कहती है जनता?

इस मुद्दे पर देशभर में नाराजगी बढ़ रही है। अभिभावकों का कहना है कि सरकार को स्कूलों की मनमानी पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। गाइडलाइंस तो बनती हैं, लेकिन उनका पालन करवाना सबसे जरूरी है।विशेषज्ञ मानते हैं कि शिक्षा को व्यापार बनने से रोकना जरूरी है। पारदर्शिता, सख्त नियम और निगरानी से ही इस समस्या का हल निकल सकता है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा का खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर हो सकता है।

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