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Tuesday, April 23, 2024
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विपक्षी पार्टियों को अमित शाह की दो टूक “हवन में हड्डी नहीं डालनी चाहिए”

22 जनवरी को देश रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। आज लोकसभा में मोदी सरकार की ओर से राम मंदिर पर धन्यावाद प्रस्ताव पेश किया गया। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि राम मंदिर आंदोलन को जाने बिना इस देश के इतिहास को कोई पढ़ ही नहीं सकता। 1528 से हर पीढ़ी ने इस आंदोलन से जुड़ी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समय में ही यह परवान चढ़ा और सपना साकार हुआ। राम जन्मभूमि का इतिहास लंबा। राजाओं, संतों, निहंगों और कानून विशेषज्ञों ने इस लड़ाई में अपना योगदान दिया है। इन सभी योद्धाओं का आज हम विनम्रता से स्मरण करना चाहते हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नियम 193 के तहत ‘ऐतिहासिक श्रीराम मंदिर के निर्माण और श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा’ विषय पर चर्चा में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज किसी का जवाब नहीं दूंगा। मैं मन की बात और जनता के मन की बात देश के सामने रखना चाहता हूं। वह आवाज, जो वर्षों से अदालत के कागजों में दबी हुई थी। 22 जनवरी 2024 के बारे में भले ही कुछ लोग कुछ भी कहें, वह दिन सैकड़ों साल से भी ज्यादा वर्षों के लिए ऐतिहासिक दिन बना रहेगा।

“भारत की संस्कृति और रामायण को अलग करके देखा ही नहीं जा सकता”

उन्होंने कहा कि 1528 से चल रही संघर्ष और अन्याय के खिलाफ लड़ाई की जीत का दिन है। 22 जनवरी 2024 का दिन समग्र भारत की आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण का दिन है। देश की कल्पना राम और राम चरित्र के बगैर नहीं हो सकते। राम और राम का चरित्र भारत के जनमानस का प्राण है। संविधान की पहली प्रति से लेकर महात्मा गांधी के आदर्श भारत की कल्पना तक राम का नाम लिया जाता रहा।

उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति और रामायण को अलग करके देखा ही नहीं गया। कई भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों में रामायण का जिक्र है। कई सारे देशों ने रामायण को स्वीकारा और आदर्श ग्रंथ के रूप में प्रस्थापित किया है। राम और रामायण से अलग देश की कल्पना हो ही नहीं सकती।

अमित शाह ने कहा कि भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी जो बोलते हैं, वो करते हैं। हम 1986 से कह रहे थे कि वहां भव्य राम मंदिर बनना चाहिए। कुछ लोग यहां प्रतिक्रिया दे रहे थे। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की खंडपीठ के फैसले से आप वास्ता रखते हैं या नहीं? आप फैसले से कैसे कन्नी काट सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने भारत के पंथ निरपेक्ष चरित्र को उजागर किया है। दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं हुआ, जब बहुसंख्यक समाज ने अपनी आस्था का निवर्हन करने के लिए इतनी लबी लड़ाई लड़ी हो और इंतजार किया हो। हमने राह देखी है, लड़ाई लड़ी है। हवन में हड्डी नहीं डालनी चाहिए।

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