पांडवानी की महान लोकगायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रविवार को निधन हो गया। उन्होंने 70 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय लोककला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। दशकों तक अपनी ओजस्वी आवाज और अनूठी प्रस्तुति शैली से उन्होंने पांडवानी को देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।
लोककला की अमूल्य धरोहर थीं तीजन बाई
डॉ. तीजन बाई को पांडवानी परंपरा की सबसे प्रभावशाली प्रस्तुतिकारों में गिना जाता था। उन्होंने महाभारत की कथाओं को अपनी विशिष्ट गायन शैली और अभिनय के साथ प्रस्तुत कर इस लोककला को नई पहचान दिलाई। उनकी प्रस्तुतियां भारत सहित दुनिया के कई देशों में सराही गईं और उन्होंने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुख्यमंत्री ने जताया गहरा शोक
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय लोक संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कहा कि अपनी अद्वितीय कला, ओजस्वी स्वर और आजीवन समर्पण के बल पर उन्होंने भारतीय लोक परंपरा को विश्वभर में सम्मान दिलाया। मुख्यमंत्री ने शोकाकुल परिवार और उनके प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना की।
आने वाली पीढ़ियों के लिए रहेंगी प्रेरणा
तीजन बाई को भारतीय लोकसंगीत की जीवित विरासत माना जाता था। उन्होंने पांडवानी जैसी पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का लगातार प्रयास किया। उनकी कला, संघर्ष और समर्पण आने वाले कलाकारों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। उनके निधन से भारतीय सांस्कृतिक जगत ने एक ऐसी शख्सियत को खो दिया है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।
