- विज्ञापन -
Home Uttar Pradesh Debate on Rarest of Rare: यूपी के ऐसे जज जिन्होंने सुनाई 22...

Debate on Rarest of Rare: यूपी के ऐसे जज जिन्होंने सुनाई 22 दोषियों को मौत की सजा, जानिए क्यों इस पर छिड़ी बहस

Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर इन दिनों मौत की सजा सुनाए जाने को लेकर चर्चा में हैं। मुजफ्फरनगर में कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने कई गंभीर आपराधिक मामलों में दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बीते कुछ महीनों में 10 मामलों में कुल 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई है। इससे देश में रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत को लेकर बहस तेज हो गई है।

कई मामलों में सुनाई मौत की सजा

- विज्ञापन -

मुजफ्फरनगर में जज दिवाकर ने अप्रैल में एडवोकेट समीर सैफी हत्याकांड में तीन दोषियों को मौत की सजा सुनाई। इसके बाद 28 अप्रैल को हत्या के एक मामले में एक ही परिवार के चार सदस्यों को फांसी की सजा दी गई। मई और जून में भी अलग-अलग मामलों में दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई।

जुलाई और अगस्त में भी कई मामलों में ऐसी सजाएं सुनाई गईं। इनमें हत्या, लूट और ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड की हत्या जैसे गंभीर अपराध शामिल बताए गए हैं।

बरेली में भी सुनाई थी 13 मौत की सजाएं

रवि कुमार दिवाकर इससे पहले बरेली में तैनात थे। वहां उन्होंने 13 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। बरेली में चाइमार हसीन गैंग के आठ सदस्यों को तीन लोगों की हत्या और डकैती के मामले में फांसी की सजा सुनाने का मामला भी चर्चा में रहा था। इस तरह उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर उनके द्वारा सुनाई गई मौत की सजाओं की संख्या 35 तक बताई जा रही है।

‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ पर सवाल

लगातार मौत की सजाओं को लेकर कानूनी विशेषज्ञों के बीच बहस शुरू हो गई है। एक वकील के मुताबिक, मृत्युदंड केवल बेहद असाधारण मामलों में और ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए दिया जाना चाहिए।

वहीं, सत्र अदालत द्वारा दी गई हर मौत की सजा की उच्च न्यायालय से पुष्टि जरूरी होती है। अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय की मंजूरी के बाद ही प्रभावी होता है।

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

रवि कुमार दिवाकर मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 में न्यायिक अधिकारी हैं। इससे पहले वह आजमगढ़, सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी, बरेली और चित्रकूट में सेवाएं दे चुके हैं। वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर की वीडियोग्राफी के आदेश के बाद भी वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे।

 

- विज्ञापन -
Exit mobile version