vegetable prices: देश के प्रमुख थोक बाजारों में सब्जियों की कीमतों में आई अचानक गिरावट ने दो अलग-अलग तस्वीरें पेश की हैं। जहाँ एक ओर रसोई का बजट कम होने से आम उपभोक्ताओं ने राहत की सांस ली है, वहीं दूसरी ओर देश का अन्नदाता अपनी लागत निकालने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। जनवरी 2026 से अब तक ‘टॉप’ (टमाटर, आलू, प्याज) सब्जियों के दाम धड़ाम हो गए हैं। स्थिति यह है कि कई मंडियों में किसानों को अपनी फसल कौड़ियों के दाम बेचनी पड़ रही है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव देखा जा रहा है।
इन सब्ज़ियों के दामों में भारी गिरावट
आंकड़ों पर नजर डालें तो दिल्ली की आजादपुर मंडी में आलू की कीमतें करीब 40 प्रतिशत तक गिरकर ₹4 प्रति किलो के निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। महाराष्ट्र की लासलगांव मंडी, जो प्याज का सबसे बड़ा केंद्र है, वहां भी कीमतें 50 प्रतिशत तक टूटकर ₹10 से ₹11 प्रति किलो के आसपास बनी हुई हैं। सबसे बुरा हाल टमाटर का है, जिसकी कीमतों में 80 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। पिंपलगांव मंडी में टमाटर अब महज ₹7 प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है, जिससे किसानों की ढुलाई का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया है।
अनाज के बाजार में भी सुस्ती का रुख
सब्जियों के साथ-साथ बुनियादी खाद्य पदार्थों जैसे गेहूं और चावल की कीमतों में भी नरमी देखी जा रही है। पिछले कुछ हफ्तों में गेहूं के दाम में 10 प्रतिशत और चावल में 5 से 6 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह गिरावट वैश्विक बाजार के रुझानों और घरेलू स्टॉक की बेहतर स्थिति के कारण हुई है। हालांकि उपभोक्ता के लिए यह सुखद है, लेकिन बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गिरावट जारी रही तो भविष्य में बुवाई के रकबे पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
क्यों आई कीमतों में यह भारी गिरावट?
इस साल बंपर उत्पादन और फसल के सीजन में मंडियों में भारी आवक इस गिरावट का प्राथमिक कारण है। इसके साथ ही, पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय मांग कमजोर हुई है और प्याज जैसे उत्पादों के निर्यात पर बुरा असर पड़ा है। घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ने से कीमतें अनियंत्रित रूप से गिर गई हैं। इसके अलावा, एलपीजी (LPG) संकट ने भी आग में घी डालने का काम किया है। गैस की कमी के चलते होटलों और रेस्टोरेंट्स में टमाटर और अन्य सब्जियों की खपत में भारी कमी आई है, जिससे पिछले एक महीने में ही मांग 40 प्रतिशत तक गिर गई है।
लागत से कम पर बेचने की मजबूरी
महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में टमाटर और प्याज की प्रचुर उपलब्धता के कारण अंतरराज्यीय मांग ठप हो गई है। स्थानीय स्तर पर देसी सब्जियों की अधिकता ने बाहरी राज्यों से आने वाली सप्लाई की जरूरत कम कर दी है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि जहां सस्ती सब्जियां खुदरा महंगाई दर (CPI) को कम करने में सरकार की मदद कर रही हैं, वहीं किसानों की घटती आय ग्रामीण भारत में मांग और खपत को प्रभावित कर सकती है। सरकार से अब इन फसलों के लिए बेहतर भंडारण और न्यूनतम समर्थन सुनिश्चित करने की मांग तेज होने लगी है।
