Uttar Pradesh में नगरीय परिवहन व्यवस्था को मजबूत बनाने की योजना फिलहाल धीमी रफ्तार में चल रही है। जनवरी 2026 में 1225 नई इलेक्ट्रिक बसों की खरीद को मंजूरी मिलने के बावजूद पांच महीने बाद भी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है। इसका असर प्रदेश के बड़े शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है।
शहरों में बसों की भारी कमी
प्रदेश के शहरों में लगातार बढ़ते ट्रैफिक जाम और सार्वजनिक वाहनों की कमी से लोगों को काफी परेशानी हो रही है। कई यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचने के लिए बार-बार वाहन बदलने पड़ रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में करीब 6000 सिटी बसों की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में केवल 740 बसें ही संचालित हो रही हैं। राजधानी Lucknow में एक समय 250 से अधिक बसें चलती थीं, लेकिन अब केवल 115 इलेक्ट्रिक बसें ही सड़कों पर हैं।
पुरानी बसें हुईं बाहर, नई नहीं आईं
वर्ष 2009-10 में जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन के तहत प्रदेश के सात शहरों को 1140 सीएनजी और डीजल बसें मिली थीं। अब इन बसों ने अपनी 15 वर्ष की समयसीमा पूरी कर ली है और अधिकांश बसों को सड़कों से हटा दिया गया है।
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के मानकों के अनुसार प्रति एक लाख आबादी पर 30 सिटी बसें होनी चाहिए, लेकिन प्रदेश के अधिकांश शहर इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं।
17 नगर निगमों में चलेंगी नई बसें
नगर विकास विभाग ने प्रदेश सरकार को प्रस्ताव भेजकर 17 नगर निगमों में 1225 नई वातानुकूलित इलेक्ट्रिक बसें उपलब्ध कराने की मांग की थी। जनवरी में मुख्य सचिव एसपी गोयल की अध्यक्षता वाली बैठक में इसे मंजूरी भी मिल चुकी है। इनमें 200 बसें केवल लखनऊ को दी जानी हैं।
इसके अलावा इलेक्ट्रिक बसों के लिए कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट और 272 पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों के विकास की योजना भी प्रस्तावित है।
लखनऊ-कानपुर प्रोजेक्ट भी अटका
लखनऊ और Kanpur में 100-100 इलेक्ट्रिक बसें चलाने का पायलट प्रोजेक्ट भी आगे नहीं बढ़ पाया। कई बार टेंडर जारी होने के बावजूद निजी कंपनियों ने इसमें रुचि नहीं दिखाई।
