Medicines Expensive: देश में बढ़ती महंगाई के बीच अब आम लोगों को एक और झटका लग सकता है। रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कई जरूरी दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी होने जा रही है। इनमें बुखार और दर्द में दी जाने वाली पैरासिटामोल, कुछ एंटीबायोटिक्स, एलर्जी और हृदय रोगों के उपचार में उपयोग होने वाली दवाएं भी शामिल हैं। दवाओं की कीमतों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हो रही है जब पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च लगातार बढ़ रहा है। उत्पादन खर्च बढ़ने के कारण दवा कंपनियों पर दबाव बढ़ा है। इसका असर अब दवाओं की कीमतों में दिखाई दे रहा है।
क्यों बढ़ रही हैं दवाओं की कीमतें?
दवा उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार, कई दवाओं के निर्माण में उपयोग होने वाले एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) और अन्य कच्चे पदार्थों की लागत पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है। इसके अलावा पैकेजिंग सामग्री, बिजली और लॉजिस्टिक्स खर्च में भी इजाफा हुआ है।
सरकार हर साल कुछ आवश्यक दवाओं की कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की अनुमति देती है। यह बढ़ोतरी थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार पर तय की जाती है। इसी प्रक्रिया के तहत कई दवाओं के दामों में संशोधन किया जाता है।
किन मरीजों पर पड़ेगा ज्यादा असर?
दवा कीमतों में वृद्धि का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ सकता है जो लंबे समय से किसी बीमारी का इलाज करा रहे हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और अन्य क्रॉनिक बीमारियों से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे में कीमत बढ़ने से उनके मासिक चिकित्सा खर्च में इजाफा हो सकता है।
इसके अलावा छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मरीजों के लिए भी यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है।
क्या करें मरीज?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बदलने या इलाज रोकने की गलती न करें। यदि किसी दवा की कीमत अधिक लग रही है तो डॉक्टर या फार्मासिस्ट से उसके किफायती विकल्पों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। साथ ही जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध जेनेरिक दवाएं भी कई मामलों में कम कीमत पर मिल सकती हैं।
स्वास्थ्य बजट पर बढ़ेगा दबाव
स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी से आम परिवारों के स्वास्थ्य बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। ऐसे में दवा खरीदते समय जागरूकता और सही जानकारी पहले से ज्यादा जरूरी हो गई है।
