मकर संक्रांति पूरे भारत में एक ही खगोलीय घटना – सूर्य के मकर राशि में प्रवेश – की नज़र से देखी जाती है, लेकिन नाम, रीति–रिवाज और व्यंजन हर कुछ सौ किलोमीटर पर बदल जाते हैं। मकर चौला से लेकर टुसू तक यह एक ऐसा त्योहार है जो दर्जनों रूपों में दिखता है, पर अर्थ एक ही – नई फसल, नया मौसम और नए शुभारंभ का उत्सव।
कितने नाम, कितने रूप?
एक ही संक्रांति को देश भर में दर्जनों नामों से जाना जाता है। प्रमुख नाम और क्षेत्र इस तरह हैं:
मकर संक्रांति / मकर संक्रांती – उत्तर भारत, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड, गोवा, कर्नाटक, आंध्र–तेलंगाना आदि।
पोंगल / उझावर तिरुनाल – तमिलनाडु, श्रीलंका सहित तमिल प्रवासी समुदाय।
लोहड़ी – पंजाब, हरियाणा, हिमाचल का मैदानी हिस्सा (संक्रांति की पूर्व संध्या पर)।
उत्तरण / उत्तरायण – गुजरात, पश्चिम यूपी, उत्तराखंड के कुछ हिस्से।
माघ बिहू / भोगाली बिहू – असम और आसपास।
माघी / माघी संग्रांद – पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू क्षेत्र।
खिचड़ी / खिचड़ी संक्रांति – पूर्वी यूपी, बिहार, पूर्वांचल–भोजपुरी बेल्ट।
दही–चूड़ा / तिल–सक्रांत – बिहार, मिथिला क्षेत्र।
मकरविलक्कु – केरल (सबरीमला से जुड़ा रूप)।
सुघी / सुग्गी हब्बा, मकर संक्रामना – कर्नाटक।
पौष संक्रांति / मोकोर सोनक्रांति, पुसनार / पुष्ना – पश्चिम बंगाल, असम–मेघालय के कुछ हिस्से।
सक्रात / सुक्खरात / सुकरात – हरियाणा, राजस्थान, मध्य भारत के कुछ हिस्से।
घुघुतिया / उत्तरायणी – उत्तराखंड (काले कौवा, घुघुते वाले त्योहार के रूप में)।
पड़ोसी देशों और दक्षिण–पूर्व एशिया में – माघे संक्रांति (नेपाल), सोंगक्रान (थाईलैंड), थिंग्यान (म्यांमार) आदि रूप भी इसी सूर्य–संक्रमण से जुड़े हैं।
मकर चौला: ओडिशा–पूर्व भारत की परंपरा
मकर चौला (कहीं–कहीं मकर चावल या चूड़ा रूप में) ओडिशा, झारखंड, बंगाल–तटीय इलाकों में मकर संक्रांति के दिन बनाया जाने वाला खास प्रसाद है।
इसमें नए चावल, गुड़, तिल, नारियल, केला, गन्ना आदि मिलाकर एक मीठा नैवेद्य बनाया जाता है, जिसे सूर्य देव और लोकदेवताओं को अर्पित कर परिवार में बांटा जाता है।
ओडिशा में कोणार्क के सूर्य मंदिर और कई गांवों में इसे ‘मकर चउला भोग’ के रूप में खास महत्त्व दिया जाता है।
पूर्वी भारत में यही भाव उत्तर भारत की खिचड़ी, बिहार की दही–चूड़ा और असम की भोगाली बिहू की पिठा–लड्डू परंपरा में दिखता है – नई फसल का पहला हिस्सा देवता और समाज के नाम।
टुसू: छोटानागपुर–झारखंड–बंगाल की सांझी संक्रांति
टुसू (Tusu/Tushu) पर्व मुख्य रूप से छोटानागपुर बेल्ट – दक्षिण–पश्चिम बंगाल, दक्षिण–पूर्व झारखंड, उत्तर–पूर्व ओडिशा और असम की कुछ चाय बगान बस्तियों में मकर संक्रांति से जुड़ा फसल उत्सव है।
पूरे पौष माह में गांव की महिलाएं गोबर से बने छोटे–छोटे चौखटों/ढांचों पर चावल की भूसी, रंग–रोगन और लोक–आर्ट (अल्पना आदि) से टुसू देवी की प्रतिमा तैयार करती हैं।
संक्रांति की पूर्व संध्या पर धान की भूसी और सूखी घास से अलाव (बोनफायर) जलाए जाते हैं, युवा लड़कियां–महिलाएं टुसू गीत गाते–गाते रात भर नाचती–जागती हैं – यह अग्नि, फसल और देवी तीनों का उत्सव है।
मकर संक्रांति के दिन या उसके बाद टुसू की प्रतिमाओं का जल–विसर्जन किया जाता है; कई जगह मेलों (टुसू मेला) का आयोजन होता है जहां लोकगीत, नृत्य, हाट–बाजार सब एक साथ होते हैं।
टुसू की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह महिला–प्रधान, लोक–उत्सव है – जहां गीतों में मौसम, प्रेम, फसल, समाज और राजनीति तक पर तंज और उमंग दोनों दर्ज होते हैं।
बाकी प्रदेशों की लोकप्रिय परंपराएं
एक ही तारीख के आसपास देश भर में कई अलग–अलग लेकिन समान भाव वाली परंपराएं दिखती हैं।
पंजाब–हरियाणा–हिमाचल (लोहड़ी–माघी)
13 जनवरी की रात लोहड़ी पर अलाव, मूंगफली, रेवड़ी, गजक के साथ नाच–गान;
14 को माघी/संक्रांति पर सरसों का साग, मक्की की रोटी, पवित्र स्नान और दान।
गुजरात (उत्तरायण)
14 जनवरी को आसमान पतंगों से भर जाता है; छतों पर दही–चिवड़ा, ऊंधियू, तिल–गुड़ की चिकी, “ऊंचे उड़े रे काइट” वाला माहौल।
तमिलनाडु (पोंगल)
4 दिन का उत्सव – भोगी, थाई पोंगल, मट्टू पोंगल, काणुम पोंगल;
मिट्टी के नए बर्तनों में “पोंगल–पोंगल” कहते हुए खौलता मीठा चावल, गाय–बैल की पूजा, खेत–खलिहान का उत्सव।
असम (माघ बिहू / भोगाली बिहू)
मेजी (बांस–पुआल के बड़े अलाव) जलाना, रात भर कम्युनिटी भोज, अगली सुबह अलाव की राख को शुभ मानकर खेतों में डालना।
बिहार–पूर्वी यूपी (खिचड़ी, दही–चूड़ा)
तिल–गुड़, चना, गुड़ वाली खिचड़ी, दही–चूड़ा, तिलकूट;
गंगा या नजदीकी नदी में स्नान, दान–पुण्य, काली–गाय को खिचड़ी खिलाने जैसी स्थानीय रस्में।
महाराष्ट्र (हल्दी–कुमकुम)
“तिळगूळ घ्या, गोड गोड बोला” कहते हुए तिल–गुड़ के लड्डू बांटना, महिलाओं का हल्दी–कुमकुम समारोहम – सामाजिक–सांस्कृतिक नेटवर्क को मजबूत करने की रस्म।
इन सब में कॉमन धागा है – सूर्य की उत्तरायण यात्रा, सर्दी के उतरने की शुरुआत और रबी फसल की कटाई–खुशी।








