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Thursday, January 8, 2026
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2 अरब लोगों का पानी खतरे में, हिंदू कुश हिमालय को चाहिए 12 ट्रिलियन डॉलर क्लाइमेट फंड

हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र आर्थिक संकट से जूझ रहा है, जो ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नदियों के पानी पर निर्भर करीब दो अरब लोगों के लिए खतरा बन गया है। ICIMOD की नई रिपोर्ट के अनुसार, 2020 से 2050 तक जलवायु अनुकूलन और शमन के लिए क्षेत्र को लगभग 12.065 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता होगी, लेकिन वर्तमान फंडिंग इसकी पूर्ति के बहुत कम है।

HKH क्षेत्र का महत्व और संकट

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान के आठ देशों में फैला 3,500 किमी लंबा पर्वत श्रृंखला है। इसके ग्लेशियर दस प्रमुख नदियों (गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु आदि) को पानी देते हैं, जो दक्षिण एशिया के करीब 2 अरब लोगों के पेयजल, सिंचाई, ऊर्जा और आजीविका का स्रोत हैं। जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे बाढ़, सूखा, जैव विविधता हानि और चरम मौसम बढ़ रहे हैं।

क्लाइमेट फाइनेंसिंग में भारी कमी

ICIMOD की ‘क्लाइमेट फाइनेंस सिंथेसिस रिपोर्ट’ में अनुमान लगाया गया कि 2020-2050 के बीच कुल 12.065 ट्रिलियन डॉलर (वार्षिक औसत 768.68 बिलियन डॉलर) चाहिए। इसमें भारत और चीन की हिस्सेदारी 92.4% (8.46 ट्रिलियन और 2.69 ट्रिलियन) है, जबकि बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे कमजोर देशों में प्रति व्यक्ति फाइनेंसिंग जरूरत 24 डॉलर से 2,126 डॉलर तक है (GDP का 6% से 57%)। वर्तमान प्रतिबद्धताएं अपर्याप्त हैं, जिससे अनुकूलन बोझ वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है।

असमानता और प्रभाव

रिपोर्ट असमानता पर जोर देती है: जलवायु प्रभावित देशों की वित्तीय क्षमता कम है, जिससे आपदा प्रबंधन पर दबाव बढ़ा है। अफगानिस्तान, नेपाल, पाकिस्तान जैसे देश मरम्मत के चक्र में फंसे हैं। ग्लेशियर पिघल से 2100 तक 30-50% बर्फ घट सकती है, जो पानी की कमी, कृषि हानि और बुनियादी ढांचे को प्रभावित करेगी।

समाधान के सुझाव

रिपोर्ट तीन ट्रैक सुझाती है: बहुपक्षीय फंडों तक पहुंच बढ़ाना, डेट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप्स जैसे नवीन उपकरण, निजी क्षेत्र भागीदारी। HKH क्लाइमेट फाइनेंस नेटवर्क, ग्रीन बॉन्ड्स, कार्बन मार्केट और डेटा सुधार पर जोर। ICIMOD के डीजी पेमा ग्यामत्सो ने कहा, “यह आर्थिक समानता का मुद्दा है; सामूहिक रचनात्मक प्रयास जरूरी।”

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