ईरान–इजरायल तनाव और ईरान के अंदरूनी हालात ने मिलकर भारत के बासमती चावल निर्यात और घरेलू कीमतों पर सीधा दबाव बना दिया है। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) का कहना है कि ईरान को जाने वाले शिपमेंट अटक रहे हैं, पेमेंट साइकिल गड़बड़ा गई है और इसी वजह से भारतीय मंडियों में बासमती के दाम कमजोर पड़ गए हैं।
ईरान में क्या हुआ और भारत पर असर कैसे पड़ा?
ईरान लंबे समय से भारत के बासमती चावल के लिए सबसे बड़े बाजारों में से एक है; चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल–नवंबर के बीच भारत ने ईरान को करीब 5.99 लाख टन बासमती, 468 मिलियन डॉलर से अधिक मूल्य का निर्यात किया।
ईरान–इजरायल टकराव, अमेरिकी दबाव और ईरान की घरेलू अस्थिरता (प्रदर्शन, आर्थिक संकट, रियाल की कमजोरी) के कारण वहां की मुद्रा और बैंकिंग सिस्टम दबाव में हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों को भुगतान समय पर नहीं मिल पा रहा।
IREF के मुताबिक, ईरान के कई इंपोर्टर्स ने साफ कहा है कि वे फिलहाल पुराने कॉन्ट्रैक्ट भी समय पर ऑनर और रेमिट करने की स्थिति में नहीं हैं, जिससे शिपमेंट रोकने पड़े हैं।
यानी तनाव सिर्फ राजनीतिक या सुरक्षा मोर्चे पर नहीं, ट्रेड और पेमेंट चैनल पर भी दिख रहा है।
IREF ने क्या कहा?
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने हालिया स्टेटमेंट में स्थिति को “गंभीर” बताते हुए कुछ अहम बातें रखीं।
IREF ने चेतावनी दी कि ईरान की मौजूदा अशांति और करेंसी क्राइसिस की वजह से पेमेंट डिले, शिपमेंट पोस्टपोन, और कॉन्ट्रैक्ट कैंसिलेशन तेजी से बढ़ रहे हैं।
फेडरेशन ने निर्यातकों से कहा है कि
ईरान से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट्स के जोखिम को दोबारा आकलन करें,
सिक्योर्ड पेमेंट मैकेनिज्म अपनाएं (LC, एडवांस, कन्फर्म्ड बैंक गारंटी आदि),
और ईरान के लिए रखे गए स्टॉक पर अत्यधिक लेवरेज न लें।
IREF अध्यक्ष प्रेम गर्ग के अनुसार, ईरान ऐतिहासिक रूप से भारत के बासमती के लिए “पिलर मार्केट” रहा है, लेकिन मौजूदा उथल-पुथल ने ट्रेड फ्लो, पेमेंट और बायर कॉन्फिडेंस तीनों को हिला दिया है।
फेडरेशन ने सलाह दी है कि निर्यातक वेस्ट एशिया, अफ्रीका और यूरोप जैसे दूसरे बाजारों में डाइवर्सिफिकेशन बढ़ाएं, ताकि ईरान पर निर्भरता कम हो।
घरेलू बाजार में कीमतें क्यों गिरीं?
ईरान से डिमांड और पेमेंट रुकने का सीधा असर भारतीय मंडियों में दिखने लगा है।
IREF और ट्रेड सोर्सेज के मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में ही प्रमुख बासमती किस्मों की कीमतों में लगभग ₹5–10 प्रति किलो तक की गिरावट दर्ज की गई है।
खास तौर पर 1121, 1509, 1718 जैसी मेरठ–कर्नाल–कुरुक्षेत्र बेल्ट की वैरायटीज़ में खरीद कमजोर हुई है; खरीदार कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से बच रहे हैं या शर्तें बदल रहे हैं।
मंडियों में स्टॉक जमा हो रहा है क्योंकि
जो माल ईरान के लिए रखा था, उसका रोलओवर या रीरूट तुरंत नहीं हो पा रहा,
और नई क्रॉप के साथ सप्लाई भी बाजार में आ रही है, जबकि एक्सपोर्ट ऑफटेक स्लो है।
इसका नतीजा यह है कि किसान और ट्रेडर्स दोनों को कीमतों में नरमी झेलनी पड़ रही है, भले ही प्रीमियम क्वालिटी बासमती की कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन बढ़ चुकी हो।
आगे के लिए क्या संकेत हैं?
IREF का अनुमान है कि जब तक ईरान की राजनीतिक–आर्थिक स्थिति और ईरान–इजरायल तनाव पर कुछ स्थिरता नहीं आती, तब तक प्राइस वोलैटिलिटी, लिक्विडिटी स्ट्रेस और सेंटिमेंट में कमजोरी बनी रह सकती है।
इंडस्ट्री बॉडीज़ उम्मीद कर रही हैं कि भारत सरकार बैंकिंग/पेमेंट चैनल, रूसी रूट या बार्टर–टाइप मैकेनिज्म जैसे विकल्पों पर भी कूटनीतिक स्तर पर बातचीत करे, ताकि ईरान के साथ ट्रेड को कुछ राहत मिल सके।

