सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के काटने से होने वाली मौतों और हमलों को लेकर अब बेहद सख्त संकेत दे दिए हैं। बेंच ने साफ कहा है कि अगर राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय नियमों के मुताबिक व्यवस्था नहीं करते, तो हर डॉग-बाइट, खासकर बच्चों व बुजुर्गों की मौत या गंभीर चोट पर उन पर भारी मुआवजा डालने पर विचार किया जाएगा, साथ ही कुत्तों को खिलाने वाले लोगों की भी जवाबदेही तय होगी।
कोर्ट ने क्या कहा?
तीन जजों की बेंच – जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया – स्ट्रे डॉग बाइट के मामलों पर चल रही सुनवाई के दौरान बेहद कड़ी टिप्पणियां कीं।
-
बेंच ने कहा, “हर डॉग बाइट, हर मौत या गंभीर चोट के लिए हम राज्य पर भारी मुआवजा डालने पर विचार करेंगे, क्योंकि उन्होंने कोई व्यवस्था नहीं की।”
-
कोर्ट ने यह भी कहा कि जो लोग खुद को डॉग लवर या फीडर बताते हैं, उनके लिए भी जवाबदेही तय की जाएगी:
-
“जो लोग कहते हैं कि वे कुत्तों को खिलाते हैं, उन्हें उन्हें अपने घर ले जाना चाहिए। वे सड़कों पर क्यों घूमें, लोगों को काटें और डराएं?”
-
-
जस्टिस मेहता ने तीखी टिप्पणी की कि जमीन पर जो बच्चे मर रहे हैं या बुरी तरह जख्मी हो रहे हैं, उनके लिए “मानवीय सहानुभूति” कहां है, सिर्फ कुत्तों के लिए ही भावनाएं क्यों दिखती हैं।
राज्य सरकारों पर सख्त जिम्मेदारी
कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि स्ट्रे डॉग प्रॉब्लम सिर्फ “कुत्तों बनाम इंसान” का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य की नाकामी है।
-
सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों के बावजूद कई बड़े राज्यों – उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब आदि – ने समय पर हलफनामा तक दाखिल नहीं किया और न ही पर्याप्त नसबंदी, टीकाकरण या शेल्टर की व्यवस्था की।
-
कोर्ट ने कहा कि अस्पतालों, स्कूलों, कॉलोनियों और संस्थागत परिसरों जैसी “संवेदनशील जगहों” को डॉग-बाइट से सुरक्षित करना राज्य–नगर निगम की सीधी जिम्मेदारी है और आठ हफ्ते के भीतर ऐसी जगहों को सुरक्षित करने पर जोर दिया।
-
जजों ने चेतावनी दी कि आगे होने वाली घटनाओं के लिए जिम्मेदार अधिकारी व्यक्तिगत रूप से भी जवाबदेह ठहराए जा सकते हैं।
डॉग फीडर और एनजीओ की जवाबदेही
कोर्ट ने पहली बार बहुत साफ शब्दों में कहा कि सिर्फ सरकार ही नहीं, कुत्तों को खिलाने वाली संस्थाएं और व्यक्ति भी जिम्मेदार होंगे।
-
जस्टिस मेहता ने सवाल उठाया: “जहां 9 साल का बच्चा उन कुत्तों के हमले में मारा जाता है जिन्हें कोई संगठन रोज़ वहीं खिला रहा है, वहां जिम्मेदार कौन होगा? क्या उस संगठन को हर्जाने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए?”
-
बेंच का संकेत है कि भविष्य में कोर्ट ऐसा फ्रेमवर्क बना सकता है जिसमें:
-
संबंधित इलाके के स्थानीय निकाय,
-
वहां फीडिंग करने वाले एनजीओ/व्यक्ति,
-
और राज्य सरकार – तीनों पर साझा या केस के अनुसार अलग–अलग जिम्मेदारी तय की जा सके।
-
कोर्ट ने यह भी कहा कि जो लोग सचमुच डॉग लवर हैं, वे शेल्टर या अपने घरों पर कुत्तों की देखभाल करें, न कि उन्हें सिर्फ पब्लिक स्पेस में खिला कर छोड़ दें।
क्या बदलेगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम आदेश नहीं दिया, लेकिन सुनवाई के दौरान जो बातें कही गईं, उनसे भविष्य की दिशा साफ दिखती है।
-
संभावित कदम जिन पर कोर्ट विचार कर सकता है:
-
हर गंभीर डॉग-बाइट / मौत के मामले में राज्य पर अनिवार्य भारी मुआवजा।
-
जिस एरिया में हमला हो, वहां की म्युनिसिपल बॉडी और डॉग फीडर / संस्था पर भी सिविल दायित्व तय करना।
-
अस्पताल, स्कूल, कैंपस, सरकारी दफ्तर जैसे इलाकों को स्ट्रे डॉग–फ्री “सेंसिटिव ज़ोन” घोषित कर वहां सख्त डॉग-कंट्रोल।
-
राज्यों को ABC (Animal Birth Control) नियमों के तहत नसबंदी–टीकाकरण–शेल्टर के लिए समयबद्ध रोडमैप दाखिल करने का निर्देश।
-
कोर्ट ने साफ कर दिया कि अब सिर्फ “भावनात्मक बहस” नहीं चलेगी; हर डॉग-बाइट के साथ किसी न किसी पर कानूनी और आर्थिक जिम्मेदारी तय होगी, ताकि राज्य और समाज दोनों मिलकर इंसानों की सुरक्षा और जानवरों के कल्याण के बीच संतुलित हल निकालें।

