अभी तक सरकार / श्रम मंत्रालय की तरफ से 10 मिनट डिलीवरी पर औपचारिक “बैन” की आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है, लेकिन दबाव इतना बढ़ चुका है कि कंपनियों को यह मॉडल ढीला छोड़ना पड़ा है और नीति-स्तर पर इसे खत्म करने की दिशा साफ दिख रही है। यानी न्यूज़ एंगल ऐसे रखिए: सरकार और श्रम मंत्रालय की दखल के बाद 10‑मिनट डिलीवरी मॉडल व्यावहारिक तौर पर खत्म करने की स्थिति में पहुंच रहा है।
क्या हुआ है अभी तक?
क्रिसमस और न्यू ईयर के आसपास स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो व अन्य प्लेटफॉर्म्स के 2 लाख से ज्यादा डिलीवरी पार्टनर्स ने 10‑मिनट डिलीवरी, कम पेआउट और असुरक्षित कामकाजी हालात के खिलाफ देशभर में हड़ताल की।
हड़ताल में मुख्य मांगें थीं:
10‑मिनट (और 15–20 मिनट) वाली “अल्ट्रा फास्ट” डिलीवरी का अंत।
प्रति किलोमीटर तय न्यूनतम रेट, फ्यूल कॉस्ट एडजस्टमेंट और फिक्स मिनिमम महीने की कमाई (कई यूनियनों ने 40,000 रुपये मासिक गारंटी की मांग की)।
दुर्घटना, स्वास्थ्य और बीमा सुरक्षा, एल्गोरिदमिक प्रेशर कम करना।
हड़ताल और मीडिया दबाव के बाद, कई बड़े प्लेटफॉर्म्स ने ऐप से “लाज़मी 10‑मिनट डिलीवरी” के प्रॉमिस को हटाना शुरू कर दिया, और केवल “फास्ट डिलीवरी” जैसे नरम शब्दों का इस्तेमाल करने लगे हैं।
सरकार और श्रम मंत्रालय की भूमिका
श्रम मंत्रालय ने गिग वर्कर्स के संगठनों और कंपनियों – जैसे स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो – के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग्स की हैं, जहां 10‑मिनट मॉडल को लेकर सुरक्षा चिंताओं पर चर्चा हुई।
नई लेबर कोड्स (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code व सोशल सिक्योरिटी कोड) के मसौदों में गिग वर्कर्स को औपचारिक रूप से ‘वर्कर’ कैटेगरी के तहत सुरक्षा नेट देने की बात है, और विशेषज्ञों ने वही कोड इस्तेमाल कर 10‑मिनट डिलीवरी मॉडल को “सुरक्षा के खिलाफ” बताया है।
2024 में उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के तहत CCPA ने भी क्विक-कॉमर्स कंपनियों को नोटिस भेजकर कहा था कि अगर वे वास्तविक रूप से ऑर्डर 10 मिनट में नहीं पहुंचा सकतीं, तो विज्ञापनों से “10 minutes or less” का दावा हटाकर कम से कम “15 minutes or less” लिखें और ईमानदार मीडियन डिलीवरी टाइम दिखाएं।
इन सब कदमों को मिलाकर देखें तो सरकार साफ संकेत दे चुकी है कि वर्कर सेफ्टी के खिलाफ जाने वाली टाइम‑बाउंड अल्ट्रा फास्ट डिलीवरी स्वीकार नहीं होगी।
“10 मिनट डिलीवरी पर रोक” को कैसे समझें?
ज़मीन पर स्थिति अभी कुछ ऐसी है:
प्लेटफॉर्म्स पर
ऑर्डर स्क्रीन से “10 मिनट गारंटी” / “10 min delivery” टैग धीरे‑धीरे हटाए जा रहे हैं।
डार्क‑स्टोर और राइडर मैनेजमेंट से “टाइम आउट होने पर पेनल्टी” वाला दबाव कम किया जा रहा है।
पॉलिसी स्तर पर
लेबर कोड्स और मंत्रालय की मीटिंग्स में इस मॉडल को औपचारिक रूप से हतोत्साहित / बैन के बराबर नियंत्रण में लाने पर सहमति बन रही है, ताकि कंपनियां राइडर्स को 10 मिनट के भीतर हर हाल में पहुंचाने के लिए मजबूर न कर सकें।
यानी भले “गजट नोटिफिकेशन” के रूप में शब्दशः ‘10 मिनट डिलीवरी बैन’ अभी न हो, लेकिन निर्देश और दबाव इतने मजबूत हैं कि कंपनियां इसे प्रैक्टिकली बंद करने की तरफ हैं।
डिलीवरी बॉयज़ की सुरक्षा पर क्या फर्क पड़ेगा?
अल्ट्रा फास्ट डिलीवरी की दौड़ में कई राइडर्स 80–90 km/h की स्पीड पर, गलत साइड से या रेड लाइट जंप करके चलते थे, जिससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता था।
यूनियनों ने संसद से लेकर राज्य सरकारों तक यह मुद्दा रखा कि ये मॉडल वर्कप्लेस सेफ्टी के कोड का उल्लंघन हैं, क्योंकि इंसेंटिव और पेनल्टी सीधे टाइमर से जुड़ी होती है।
10‑मिनट मॉडल ढीला पड़ने से राइडर्स को
थोड़ा सुरक्षित स्पीड पर चलने,
ट्रैफिक रूल्स फॉलो करने का स्पेस मिलेगा और दुर्घटना का रिस्क घटेगा।

