साल 2003 में रिलीज हुई बॉलीवुड फिल्म ‘बागबान’ को लंबे समय तक एक ऐसी भावनात्मक कहानी माना गया, जिसमें बुजुर्ग माता-पिता के संघर्ष और बच्चों की बेरुखी को बेहद संवेदनशील ढंग से दिखाया गया था। अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी की जोड़ी ने दर्शकों के दिलों को छू लिया था। हालांकि, अब करीब 23 साल बाद Gen Z यानी नई पीढ़ी ने इस फिल्म को नए नजरिए से देखकर बहस छेड़ दी है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो और चर्चाओं में Gen Z ने अमिताभ बच्चन के किरदार को ही फिल्म का ‘रियल विलन’ बता दिया है। इस बदले हुए नजरिए पर अभिनेता समीर सोनी, जिन्होंने फिल्म में बेटे संजय का किरदार निभाया था, ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा – “आखिर 20 साल बाद कुछ राहत मिली।”
‘बागबान’ की कहानी और पुराना नजरिय
रवि चोपड़ा के निर्देशन में बनी ‘बागबान’ की कहानी एक बुजुर्ग दंपती राज मल्होत्रा (अमिताभ बच्चन) और पूजा मल्होत्रा (हेमा मालिनी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें उनके चार बेटे अलग-अलग घरों में रखने को मजबूर करते हैं। फिल्म का भावनात्मक क्लाइमैक्स और अमिताभ बच्चन का लंबा संवाद दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ था।
उस दौर में दर्शकों ने बच्चों को स्वार्थी और माता-पिता को पीड़ित माना। लेकिन समय के साथ सामाजिक सोच बदली और अब नई पीढ़ी इस कहानी को ‘बूमर प्रोपेगैंडा’ तक कह रही है।
वायरल वीडियो और Gen Z का तर्क
हाल ही में एक Gen Z इंफ्लुएंसर का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने फिल्म के कई सीन का विश्लेषण किया। उनका कहना है कि समीर सोनी का किरदार संजय एक जिम्मेदार पति और समझदार बेटा था, जिसे बेवजह नकारात्मक दिखाया गया।
इंफ्लुएंसर ने सवाल उठाया कि अमिताभ बच्चन का किरदार एक प्रतिष्ठित बैंक में काम करने के बावजूद कोई बचत या फिक्स्ड डिपॉजिट क्यों नहीं करता, और जब बेटा इस पर सवाल करता है तो उसे गलत ठहरा दिया जाता है।
इसके अलावा, देर रात टाइपराइटर चलाने वाला सीन, करवा चौथ के दिन बाहर खाना खाने का मामला और घर के भीतर तालमेल की कमी जैसे उदाहरण देकर उन्होंने पिता के व्यवहार को जिद्दी और असंवेदनशील बताया।
समीर सोनी की प्रतिक्रिया: ‘नई पीढ़ी से प्यार हो गया’
इस वायरल वीडियो को समीर सोनी ने अपने इंस्टाग्राम पर साझा करते हुए लिखा – “20 साल बाद आखिरकार कुछ राहत मिली, नई पीढ़ी से प्यार हो गया।”
उन्होंने माना कि जब फिल्म रिलीज हुई थी, तब उन्हें ‘खराब बेटे’ के तौर पर देखा गया, यहां तक कि कई दर्शकों ने उन्हें निजी जीवन में भी खरी-खोटी सुनाई थी। लेकिन अब Gen Z की सोच से उन्हें संतोष मिला है कि उनके किरदार को नए नजरिए से समझा जा रहा है।
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बदली सोच और सामाजिक बदलाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में पीढ़ियों के बीच बदलते मूल्यों और प्राथमिकताओं को दर्शाती है। जहां पहले माता-पिता का त्याग सर्वोपरि माना जाता था, वहीं आज आर्थिक सुरक्षा, निजी जीवन और मानसिक संतुलन को भी उतनी ही अहमियत दी जा रही है।
Gen Z का तर्क है कि बच्चों की जिम्मेदारियों और सीमाओं को समझे बिना सिर्फ त्याग और बलिदान की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। यही कारण है कि वे ‘बागबान’ की कहानी को एकतरफा भावनात्मक दबाव मान रहे हैं।
सोशल मीडिया पर तीखी बहस
इस मुद्दे पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जमकर बहस छिड़ी हुई है। कुछ लोग Gen Z के विचारों से सहमत हैं तो वहीं कई दर्शक अब भी फिल्म को पारिवारिक मूल्यों की मिसाल मानते हैं। इस नई व्याख्या ने यह साबित कर दिया है कि समय के साथ फिल्मों का अर्थ और प्रभाव बदलता रहता है।

