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Wednesday, February 4, 2026
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बॉलीवुड में एक्शन फिल्मों पर पुरुषों का कब्जा क्यों? चित्रांगदा सिंह का बयान सुनकर चौंक जाएंगे आप

रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर’ पिछले साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शुमार हुई और दर्शकों के बीच खूब चर्चित रही क्योंकि इसने अपने भारी-भारी एक्शन, जासूसी कथानक और तेज़ गति वाले युद्ध दृश्यों के साथ बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाई।

फिल्म की इसी लोकप्रियता के बीच एक सवाल फिर से उठ रहा है — ऐसी एक्शन और वॉर ड्रामा फिल्मों में एक्ट्रेसेस को लीड रोल क्यों नहीं मिलते? हाल ही में बॉलीवुड अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ने इस पर अपने विचार साझा किये हैं, जो अब सोशल मीडिया और फिल्म जगत में चर्चा का विषय बन गये हैं।

चित्रांगदा सिंह का बयान: “यह ‘बायोलॉजी’ और सामाजिक कारण हैं”

चित्रांगदा सिंह ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि, बड़े स्केल की एक्शन/वॉर फिल्में आमतौर पर पुरुष लीड के साथ क्यों आती हैं, इसका कारण सिर्फ बायोलॉजिकल और सामाजिक मान्यताएँ हैं।

उनका कहना है कि शारीरिक क्षमता और बॉडी-लैंग्थ की अपेक्षाएँ इस तरह की फिल्मों में अक्सर पुरुष पात्रों को प्राथमिकता देती हैं क्योंकि कहानी में “जो संघर्ष और जोखिम दिखाया जाता है, वह वास्तविकता से जुड़ा लगता है”। उन्होंने माना कि कुछ लोग इस विचार से असहमत हो सकते हैं, लेकिन यह एक फैक्ट जैसा माना जाता है कि महिलाएं इतनी खतरनाक परिस्थितियों में पुरुषों की तरह भेजी नहीं जा सकतीं।

चित्रांगदा ने यह भी कहा कि इन कारणों के पीछे सामाजिक सोच और परंपरागत धारणा भी कहीं-ना-कहीं काम करती है — जैसे कि युद्ध, हिंसा और खतरों से भरी परिस्थितियों में अक्सर पुरुषों को ही प्रधानशक्ति के रूप में दिखाया जाता है।

परंतु — बदलाव के लिए सकारात्मक सुझाव

हालांकि उन्होंने बायोलॉजी को एक प्रमुख कारण बताया, चित्रांगदा सिंह ने यह भी माना कि महिलाएं भी शानदार एक्शन और कठिन किरदार निभा सकती हैं, यदि कहानी में ऐसे पात्र को सही रूप से लिखा और विकसित किया जाए।

उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्म ‘लोकाह’ का उदाहरण दिया, जिसे उन्होंने “सबसे ज़्यादा ग्रूवसम एक्शन फिल्मों में से एक” बताया और यह सिद्ध किया कि महिला एक्शन किरदार भी प्रभावशाली हो सकते हैं।

चित्रांगदा का मानना है कि अगर पटकथा में महिला पात्रों के लिए मजबूत और प्रेरणादायक भूमिका लिखी जाये, तो वह “अच्छा और रोमांचक सिनेमा” देने में सक्षम हैं।

बॉलीवुड में महिला लीड की अनदेखी — क्या सिर्फ ‘बायोलॉजी’ है कारण?

कई रिव्यू और चर्चाएँ बताते हैं कि भारत में पारंपरिक तौर पर लड़कों को ‘नायक’ की भूमिका में ज्यादा स्वीकारा जाता है, खासकर जब एक्शन-थ्रिलर या युद्ध की बात होती है।

यह भी देखा गया है कि युवा दर्शकों और फिल्म निर्माताओं को अभी भी “महिला एक्शन हीरो” की कल्पना स्वीकार्य रूप से चुनौतीपूर्ण लगती है, भले ही महिलाओं की क्षमता समान ही हो।

बॉलीवुड और लैंगिक रूढ़िवादिता: व्यापक संदर्भ

पिछले शोध बताते हैं कि भारतीय सिनेमा में लैंगिक रूढ़िवादिता और फिल्म-निर्माण के तरीके लंबे समय से चले आ रहे हैं, जहाँ पुरुष पात्रों को मुख्य रूप से निर्णायक, साहसी और संघर्षशील दिखाया जाता है, जबकि महिला पात्रों को अक्सर सहायक या पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित रखा गया है।

इसी कारण, पता चलता है कि यह समस्या सिर्फ “बायोलॉजी” तक सीमित नहीं है, बल्कि बॉलीवुड के इतिहास, कहानी-लेखन शैली और व्यापार-उपायों में जड़ें भी हैं।

चित्रांगदा सिंह के बयान ने स्पष्ट किया कि पुरुष-प्रधान लीड की प्रवृत्ति फिल्म-निर्माण का “बायोलॉजिकल और सामाजिक” आधार जानकर ही खत्म नहीं होगी — बल्कि इसके लिए कहानी, स्क्रिप्ट, निर्देशक और दर्शकों की सोच में बदलाव जरूरी है।

अगर लेखक और निर्माता महिला कलाकारों को सशक्त, वास्तविक और प्रेरक भूमिकाएँ देते हैं, तो भारत में भी एक्शन और युद्ध-थ्रिलर में महिला-लीड फिल्में दर्शकों के लिए उतनी ही रोमांचक और प्रभावशाली हो सकती हैं जितने पुरुष-लीड वाली फिल्में।

  • चित्रांगदा सिंह ने बताया कि बायोलॉजिकल और सामाजिक मान्यताएं फिल्मों में महिला-लीड कम होने का एक कारण हैं।
  • उन्होंने यह भी कहा कि अगर कहानी मजबूत हो, तो महिला एक्शन किरदार भी शानदार हो सकते हैं।
  • बॉलीवुड में लैंगिक रूढ़िवादिता और ट्रेड-नॉर्म्स भी इस प्रवृत्ति को बढ़ाते हैं।
  • बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, और नए लेखन-निर्माण से लैंगिक विविधता बढ़ सकती है।

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