राष्ट्रपति के एड-डी-कैंप (ADC) जैसे प्रतिष्ठित पद तक पहुंचना किसी भी सैन्य अधिकारी के लिए गर्व की बात होती है। लेकिन इस मुकाम के पीछे कई बार ऐसी व्यक्तिगत कीमत छिपी होती है, जिसके बारे में बाहर की दुनिया को ज्यादा जानकारी नहीं होती। मेजर ऋषभ ने राष्ट्रपति के ADC बनने के अपने अनुभव और उससे जुड़े दर्द को पहली बार साझा किया है।
प्रतिष्ठित जिम्मेदारी, लेकिन आसान नहीं था सफर
राष्ट्रपति के ADC की जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस भूमिका में अधिकारी को राष्ट्रपति के साथ रहकर कई आधिकारिक कार्यक्रमों और महत्वपूर्ण अवसरों में जिम्मेदारी निभानी होती है। वर्दी, अनुशासन और देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था के साथ काम करने का अवसर निश्चित तौर पर गौरव का विषय है।
हालांकि, इस जिम्मेदारी तक पहुंचने के लिए सिर्फ सैन्य क्षमता ही नहीं, बल्कि शारीरिक फिटनेस, अनुशासन, व्यक्तित्व और मानसिक मजबूती की भी जरूरत होती है।
मेजर ऋषभ ने पहली बार साझा किया दर्द
मेजर ऋषभ ने अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि इस प्रतिष्ठित जिम्मेदारी को हासिल करने के पीछे उनके लिए भावनात्मक संघर्ष भी रहा। जिस उपलब्धि को बाहर से देखकर लोग गर्व और सम्मान से जोड़ते हैं, उसके पीछे अधिकारी की व्यक्तिगत चुनौतियां भी हो सकती हैं।
उन्होंने अपने अनुभव के जरिए यह समझाने की कोशिश की कि सेना में किसी बड़ी जिम्मेदारी तक पहुंचना केवल पद हासिल करना नहीं होता। इसके साथ कई तरह के त्याग और जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं।
परिवार और निजी जिंदगी पर भी पड़ता है असर
सेना के अधिकारियों की जिंदगी में देश सेवा सबसे ऊपर होती है। पोस्टिंग, ड्यूटी और लगातार बदलती जिम्मेदारियों के कारण परिवार से दूरी भी कई बार झेलनी पड़ती है। मेजर ऋषभ की कहानी इसी पहलू को सामने लाती है।
राष्ट्रपति के ADC के रूप में काम करना सम्मान की बात है, लेकिन इसके लिए निजी जिंदगी में किए गए त्याग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि उनके अनुभव ने लोगों का ध्यान खींचा है।
सम्मान के पीछे छिपी कहानी
मेजर ऋषभ की बात यह याद दिलाती है कि किसी सैनिक की वर्दी के पीछे सिर्फ उपलब्धियां नहीं होतीं, बल्कि कई भावनाएं, संघर्ष और त्याग भी होते हैं। राष्ट्रपति के ADC जैसे पद तक पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उस मुकाम तक पहुंचने का सफर उतना ही चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उनकी कहानी सैन्य सेवा से जुड़े उन पहलुओं पर रोशनी डालती है, जिन्हें आम तौर पर सार्वजनिक चर्चा में कम जगह मिलती है।

