Sunita Arlikar Life Story: करीब 70 साल पहले महाराष्ट्र में जन्मी सुनीता अरलीकर की जिंदगी की शुरुआत ही मौत से जंग के साथ हुई। महज 14 दिन की उम्र में उनके पिता ने कथित तौर पर उन्हें मिट्टी में दफना दिया था। लेकिन नाना ने समय रहते उन्हें खोज लिया और उनकी जान बचा ली। यही बच्ची आगे चलकर महिला शिशु हत्या के खिलाफ आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता बनीं।
मां की मौत के बाद मासूम पर टूटा कहर
सुनीता के जन्म के करीब 13 दिन बाद उनकी मां की अचानक मौत हो गई। परिवार गरीबी से जूझ रहा था। मां की मौत के बाद नाना ने बच्ची की जिम्मेदारी उसके पिता को सौंप दी। लेकिन उन्हें बेटी के साथ हुए पुराने अत्याचार और धमकियां याद थीं। इसी डर से वह पिता के पीछे चल पड़े।
रास्ते में नदी के पास उन्हें मिट्टी का एक उथला गड्ढा दिखाई दिया। नाना ने हाथों से मिट्टी हटाई तो अंदर कपड़े में लिपटी सुनीता मिलीं। सबसे हैरानी की बात यह थी कि बच्ची अभी जिंदा थी और सांस ले रही थी।
बकरी के बाड़े में बीता बचपन
नाना सुनीता को घर ले आए। परिवार के पास इलाज की सुविधा नहीं थी। उन्हें बकरी के बाड़े में रखा गया, जहां जानवरों के शरीर से गर्मी मिलती थी। सूती बत्ती के जरिए उन्हें बकरी का दूध पिलाया जाता था। बाद में नानी ने अपनी बेटी के साथ सुनीता को भी स्तनपान कराया।
नाना ने दोनों बच्चियों को अपनी बेटियों की तरह पाला और पढ़ाई कराई। गरीबी और छुआछूत के बावजूद उन्होंने शिक्षा को सबसे ज्यादा महत्व दिया।
पढ़ाई के लिए उसी घर लौटना पड़ा
आगे की पढ़ाई के लिए सुनीता को उसी गांव जाना पड़ा जहां उनके पिता रहते थे। वहां सौतेली मां का व्यवहार बेहद खराब था। उन्हें घर के काम में लगाया जाता और उनकी किताबों से भी परेशानी की जाती थी। एक बार किताबें जलाने की कोशिश तक हुई। सुनीता को अपनी मां के साथ हुए अत्याचारों की सच्चाई भी धीरे-धीरे समझ आने लगी।
इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। मैट्रिक के बाद उन्होंने अपनी बहन के साथ लातूर के विवेकानंद अस्पताल में नर्सिंग प्रशिक्षण लिया। यहीं से उनके जीवन को नई दिशा मिली।
नर्स से सामाजिक कार्यकर्ता और नेता तक
अस्पताल में काम करते हुए सुनीता सामाजिक आंदोलनों से जुड़ गईं। 1972 के सूखे के दौरान उन्होंने राहत कार्य किए। राशन, कॉलेज फीस, भ्रष्टाचार और पुलिस हिंसा जैसे मुद्दों पर उन्होंने आवाज उठाई।
बाद में उन्होंने नर्सिंग छोड़कर सामाजिक कार्य को अपना जीवन बना लिया। 1974 में वह लातूर नगर परिषद की सदस्य चुनी गईं। आपातकाल के दौरान उन्हें पति के साथ करीब 11 महीने जेल में भी रहना पड़ा।
अपनी कहानी से दूसरी बेटियों की बनीं आवाज
सुनीता ने बाद में अपनी जिंदगी के अनुभवों को मराठी आत्मकथा ‘हिरकणीचं बिरहाद’ में दर्ज किया। उनकी कहानी सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ एक आवाज है जिसमें बेटियों को बोझ समझा जाता है।
जिस बच्ची को कभी मिट्टी के नीचे मरने के लिए छोड़ दिया गया था, वही आगे चलकर महिला शिशु हत्या के खिलाफ अभियान चलाने वाली कार्यकर्ता बनीं। सुनीता की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि सही समय पर मिली एक छोटी-सी मदद भी किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है।

