Iran Economy: मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव और इजरायल-ईरान के बीच संभावित युद्ध की आहट ने ईरान की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान के लिए उसकी मुद्रा ‘रियाल’ (Rial) का ऐतिहासिक पतन एक बड़ी चुनौती बन गया है।
मध्य-पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव का सीधा प्रहार मुद्रा बाजार पर हुआ है। तेहरान के आसमान में सक्रिय एयर डिफेंस सिस्टम और युद्ध की धमक ने ईरानी रियाल (IRR) को फर्श पर ला खड़ा किया है। 2026 की शुरुआत से अब तक इस मुद्रा ने अपनी वैल्यू का 30% से अधिक हिस्सा गँवा दिया है।
मुद्रा बाजार में अफरा-तफरी
ईरान में अनिश्चितता का आलम यह है कि लोग अपनी बचत को बचाने के लिए रियाल बेचकर डॉलर या सोना खरीदने की होड़ में हैं।
* रिकॉर्ड गिरावट: वर्तमान में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 13.5 लाख ईरानी रियाल से अधिक हो गई है।
* कारण: कूटनीतिक वार्ताओं का विफल होना, इजरायल के साथ सीधा सैन्य संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने रियाल को दुनिया की सबसे कमजोर मुद्राओं की श्रेणी में बनाए रखा है।
कौन कितना मजबूत?
भारतीय रुपये और ईरानी रियाल के बीच का अंतर इतना बढ़ गया है कि रियाल की वैल्यू भारतीय मुद्रा के सामने लगभग नगण्य महसूस होती है।
आम जनता पर दोहरी मार: मंदी और महंगाई
मुद्रा के इस अवमूल्यन (Devaluation) का सबसे बुरा असर ईरान के आम नागरिकों पर पड़ रहा है:
1. घटती क्रय शक्ति: जो सामान कल 1 लाख रियाल में मिलता था, उसकी कीमत अब कई गुना बढ़ गई है, जिससे दैनिक जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो रहा है।
2. विदेशी निवेश का शून्य होना: युद्ध के डर से विदेशी निवेशकों ने हाथ खींच लिए हैं, जिससे रोजगार और व्यापारिक ढांचा चरमरा गया है।
3. निर्यात पर पाबंदियां: तेल निर्यात पर लगी पाबंदियों के कारण देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी हो गई है।
क्या और गिरेगा रियाल?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष पूर्ण युद्ध में बदलता है, तो रियाल का मूल्य और भी तेजी से गिर सकता है। कूटनीतिक मोर्चे पर जारी गतिरोध यह संकेत दे रहा है कि आने वाले दिन ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए और भी अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।

