Mental Health: दिन-रात मरीजों की जान बचाने वाले डॉक्टरों की मानसिक सेहत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी गंभीर मुद्दे को ध्यान में रखते हुए PGI के मनोचिकित्सा विभाग ने ट्रेनी डॉक्टरों में आत्महत्या और स्वयं को नुकसान पहुंचाने की बढ़ती आशंका को रोकने के लिए एक व्यापक प्रिवेंशन फ्रेमवर्क तैयार किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते जोखिम के संकेतों की पहचान और संस्थागत सहयोग से कई कीमती जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
मानसिक दबाव बना बड़ी चुनौती
मेडिकल शिक्षा को सबसे कठिन पेशेवर प्रशिक्षणों में गिना जाता है। लंबे समय तक ड्यूटी, लगातार परीक्षाएं, गंभीर मरीजों की जिम्मेदारी, भविष्य की अनिश्चितता और पर्याप्त आराम की कमी ट्रेनी डॉक्टरों पर गहरा मानसिक दबाव डालती है। रिसर्च के अनुसार यही परिस्थितियां धीरे-धीरे अवसाद, चिंता, भावनात्मक थकान और आत्मघाती विचारों का कारण बन सकती हैं।
रिसर्च में सामने आए प्रमुख कारण
प्रोफेसर शुभ मोहन सिंह और शोधकर्ता निधि यादव के अध्ययन में बताया गया कि आत्मघाती जोखिम किसी एक वजह से नहीं बढ़ता। सामाजिक, व्यक्तिगत और कार्यस्थल से जुड़े कई कारक मिलकर इसे गंभीर बनाते हैं। आर्थिक तनाव, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक बीमारी का इतिहास, नशे की आदत, अत्यधिक कार्यभार, टॉक्सिक कार्य संस्कृति, वरिष्ठों का दबाव और वर्क-लाइफ बैलेंस की कमी प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
समय रहते पहचानना जरूरी
रिसर्च में ऐसे कई चेतावनी संकेत बताए गए हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार उदासी, व्यवहार में अचानक बदलाव, लोगों से दूरी बनाना, काम में रुचि कम होना, भविष्य को लेकर निराशा और बार-बार मौत या आत्महत्या की बातें करना मानसिक संकट के संकेत हो सकते हैं। ऐसे मामलों में तुरंत मनोवैज्ञानिक सहायता और पेशेवर परामर्श जरूरी बताया गया है।
क्या है नया प्रिवेंशन फ्रेमवर्क?
PGI का यह फ्रेमवर्क मेडिकल संस्थानों में नियमित मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग, गोपनीय काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यक्रम, सहकर्मी सहायता समूह, हेल्पलाइन और फैकल्टी प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टरों की मानसिक सुरक्षा केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की साझा जिम्मेदारी है।

