Bollywood News: बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाना आसान नहीं है, खासकर तब जब आपके पास कोई फिल्मी परिवार या गॉडफादर न हो। अभिनेता विनीत कुमार सिंह की कहानी इसी संघर्ष और जुनून की मिसाल है। बनारस से ताल्लुक रखने वाले विनीत ने नागपुर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से आयुर्वेद में एमडी की पढ़ाई पूरी की थी। उनके सामने एक सुरक्षित करियर था, लेकिन दिल एक्टिंग में लगा था।
टैलेंट हंट जीतने के बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया। इसके बाद शुरू हुआ ऐसा संघर्ष, जिसमें उन्हें कई बार छोटे-मोटे काम तक करने पड़े।
500 में निभाया लाश का किरदार
मुंबई में शुरुआती दौर विनीत के लिए बेहद मुश्किल था। उन्हें फिल्मों में छोटे रोल मिले और एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने सिर्फ ₹500 के लिए मृत शरीर का किरदार निभाया। वह सुनील शेट्टी के बॉडी डबल के तौर पर भी काम कर चुके हैं।
काम की तलाश में कई प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाने पड़े। कई बार गेट पर ही रोक दिया जाता था। इसके बावजूद विनीत ने हार नहीं मानी। उन्होंने ‘वाह! लाइफ हो तो ऐसी’ में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर भी काम किया।
उनके संघर्ष का एक दिलचस्प किस्सा यह भी है कि उस समय सेट पर छोटे ईशान खट्टर को वह अपनी गोद में खिलाया करते थे।
‘मुक्काबाज़’ ने बदल दी पूरी कहानी
जब लगातार मौके नहीं मिले तो विनीत ने अपनी कहानी खुद लिखने का फैसला किया। उन्होंने ‘मुक्काबाज़’ की स्क्रिप्ट लिखी और इसे बनाने के लिए अपनी कार तक बेच दी। बॉक्सिंग पर आधारित इस फिल्म के लिए उन्होंने कड़ी ट्रेनिंग ली।
आखिरकार अनुराग कश्यप ने फिल्म को डायरेक्ट किया और 2018 में रिलीज हुई ‘मुक्काबाज़’ ने विनीत को अलग पहचान दिलाई। उनके अभिनय को दर्शकों और समीक्षकों दोनों से खूब सराहना मिली।
‘छावा’ से मिली बड़ी पहचान
‘मुक्काबाज़’ के बाद विनीत ने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘रंगबाज़’ और ‘बार्ड ऑफ ब्लड’ जैसे प्रोजेक्ट्स में काम किया। ओटीटी ने भी उनके करियर को नई ऊंचाई दी।
इसके बाद फिल्म ‘छावा’ में कवि कलश के किरदार ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। आज विनीत कुमार सिंह उन कलाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के अपनी मेहनत से जगह बनाई।
उनकी कहानी बताती है कि रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो, अगर सपने पर भरोसा और मेहनत जारी रहे तो मंजिल आखिरकार मिल ही जाती है।

