Sim Binding: भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) ने डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लागू किए जाने वाले ‘सिम बाइंडिंग’ (Sim Binding) नियमों को लेकर मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स और स्मार्टफोन कंपनियों को बड़ी मोहलत दी है। पिछले साल नवंबर में जारी किए गए इन सख्त निर्देशों के पालन के लिए अब कंपनियों के पास दिसंबर 2026 तक का समय है। इस फैसले से करोड़ों व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे मैसेजिंग ऐप इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को तात्कालिक तकनीकी बदलावों से राहत मिली है। सरकार का उद्देश्य साइबर धोखाधड़ी पर लगाम लगाना है, लेकिन तकनीकी जटिलताओं के कारण इसकी डेडलाइन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।
क्या है सिम बाइंडिंग और यह कैसे काम करता है?
सरल शब्दों में कहें तो सिम बाइंडिंग एक ऐसी सुरक्षा तकनीक है जो आपके मैसेजिंग ऐप को आपके फोन में मौजूद फिजिकल सिम कार्ड से ‘बाँध’ देती है। वर्तमान में, आप एक बार ओटीपी (OTP) के जरिए व्हाट्सएप रजिस्टर करने के बाद फोन से सिम निकाल कर भी ऐप का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन सिम बाइंडिंग लागू होने के बाद, ऐप केवल उसी डिवाइस पर काम करेगी जिसमें वह सिम कार्ड सक्रिय (Active) अवस्था में लगा होगा। यदि आप सिम निकालते हैं, उसे निष्क्रिय करते हैं या दूसरी सिम डालते हैं, तो ऐप अपने आप लॉग आउट हो जाएगी।
क्यों बढ़ाई गई समय-सीमा?
दूरसंचार विभाग ने यह कदम स्टेकहोल्डर्स (Stakeholders) द्वारा उठाई गई तकनीकी चुनौतियों के बाद उठाया है। एप्पल (Apple) जैसी दिग्गज कंपनियों का तर्क था कि उनके iOS इकोसिस्टम की वर्तमान तकनीकी सीमाएं इस नियम को तुरंत लागू करने में बाधक हैं। वहीं, मेटा (Meta) और अन्य प्लेटफॉर्म्स ने भी इस बदलाव के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी। 30 मार्च 2026 से सरकार ने आधिकारिक तौर पर सभी कंपनियों को सूचित करना शुरू कर दिया है कि उन्हें समाधान खोजने के लिए साल के अंत तक का वक्त दिया जा रहा है।
साइबर फ्रॉड रोकने के लिए ज़रूरी
सरकार का प्राथमिक उद्देश्य टेलीकॉम और साइबर सुरक्षा को अभेद्य बनाना है। जांच में यह पाया गया था कि सिम कार्ड के बिना भी मैसेजिंग ऐप्स का एक्सेस बने रहने के कारण देश के बाहर बैठे जालसाज भारतीय नंबरों का दुरुपयोग कर साइबर फ्रॉड को अंजाम दे रहे हैं। सिम बाइंडिंग अनिवार्य होने से यूजर की पहचान और डिवाइस की भौतिक मौजूदगी सुनिश्चित होगी, जिससे फर्जी कॉल और मैसेजिंग स्कैम पर प्रभावी रूप से रोक लग सकेगी। शुरुआत में कंपनियों को केवल 90 दिनों का समय दिया गया था, जिसे अब व्यापक तकनीकी सुधारों के लिए बढ़ा दिया गया है।

