Su-57 Fighter Jet India:राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली पहुंचने के साथ रूस ने भारत को Su-57 पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की पेशकश फिर तेज कर दी है। माना जा रहा है कि मॉस्को की शुरुआती पेशकश करीब दो स्क्वाड्रन यानी 36 से 40 विमानों की हो सकती है।
हालांकि भारतीय वायुसेना के सामने चुनौती केवल अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हासिल करने की नहीं है। असली सवाल यह है कि घटते लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या को कैसे बढ़ाया जाए।
वायुसेना में स्क्वाड्रन की कमी
फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास करीब 29 से 31 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं। जबकि दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध जैसी स्थिति से निपटने के लिए स्वीकृत लक्ष्य 42 स्क्वाड्रन का है।
यानी मौजूदा क्षमता और जरूरत के बीच बड़ा अंतर है। इसके अलावा दशक के अंत तक Jaguar, MiG-29 और Mirage-2000 जैसे पुराने लड़ाकू विमान धीरे-धीरे सेवा से बाहर होने लगेंगे। ऐसे में समय पर नए विमान नहीं आए तो कमी और बढ़ सकती है।
राफेल से मिली बड़ी सीख
फ्रांस से खरीदे गए 36 Rafale विमानों ने भारतीय वायुसेना की ताकत में महत्वपूर्ण इजाफा किया। आधुनिक सेंसर, बेहतर एवियोनिक्स और Meteor मिसाइलों ने इसकी क्षमता को काफी बढ़ाया।
लेकिन 36 विमान सिर्फ दो स्क्वाड्रन के बराबर हैं। इसलिए राफेल ने वायुसेना की कुल स्क्वाड्रन कमी को खत्म नहीं किया। Su-57 के मामले में भी अगर संख्या सीमित रही तो अत्याधुनिक क्षमता मिलने के बावजूद यही समस्या सामने आ सकती है।
दो स्क्वाड्रन कितने पर्याप्त
अगर भारत 36 से 40 Su-57 खरीदता है तो उसे पांचवीं पीढ़ी की आधुनिक स्टील्थ क्षमता जरूर मिलेगी। ये विमान दुश्मन के एयर डिफेंस को दबाने, संवेदनशील ठिकानों पर हमले और हाई-वैल्यू मिशन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर एक साथ जरूरत पड़ने की स्थिति में केवल दो स्क्वाड्रन सीमित साबित हो सकते हैं। प्रशिक्षण, रखरखाव और ऑपरेशनल रिजर्व के लिए भी विमानों की जरूरत होगी।
बड़ी संख्या से बढ़ेगी क्षमता
विशेषज्ञों के मुताबिक चार से पांच स्क्वाड्रन यानी करीब 72 से 90 Su-57 विमानों का बेड़ा ज्यादा प्रभावी पांचवीं पीढ़ी की क्षमता दे सकता है।
इतनी संख्या होने पर वायुसेना अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ अभियान चला सकती है। साथ ही कुछ विमान प्रशिक्षण, रखरखाव और रिजर्व के लिए रखे जा सकेंगे। यानी Su-57 की असली उपयोगिता उसकी तकनीक के साथ पर्याप्त संख्या पर भी निर्भर करेगी।
भारत को मिल सकते औद्योगिक फायदे
बड़ी संख्या में Su-57 खरीदने की स्थिति में भारत रूस से तकनीक हस्तांतरण और घरेलू असेंबली लाइन जैसी शर्तों पर मजबूती से बातचीत कर सकता है।
भारत में स्थानीय उत्पादन होने से प्रति विमान लागत घटने की संभावना बन सकती है। इसके साथ Su-57 के लिए MRO यानी रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल की क्षमता भी विकसित की जा सकती है। इससे देश के एयरोस्पेस और रक्षा निर्माण क्षेत्र को फायदा मिल सकता है।
AMCA के लिए बनेगा पुल
भारत अपने पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी AMCA लड़ाकू विमान को विकसित कर रहा है। हालांकि इसके विकास, इंजन और उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों के कारण बड़ी संख्या में विमान मिलने में समय लग सकता है।
ऐसे में स्थानीय स्तर पर निर्मित Su-57 को AMCA तैयार होने तक अंतरिम क्षमता के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे अगर AMCA कार्यक्रम में देरी होती है तो भी वायुसेना के पास पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की मजबूत क्षमता मौजूद रहेगी।
अब बड़ा सवाल यही है कि भारत रूस की सीमित 36-40 विमानों की पेशकश पर आगे बढ़ता है या 72-90 विमानों जैसे बड़े बेड़े के जरिए अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक जरूरत पूरी करने की कोशिश करता है।

