Lucknow News: लखनऊ में केजीएमयू और सेंटर ऑफ बायो-मेडिकल रिसर्च (सीबीएमआर) की एक रिसर्च ने बच्चों और किशोरों में आने वाले मिर्गी जैसे झटकों को लेकर अहम जानकारी सामने रखी है। कई बार बच्चे अचानक बेहोश हो जाते हैं, शरीर में झटके आने लगते हैं और कुछ समय के लिए आसपास की चीजों पर प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं। ऐसे में माता-पिता इसे मिर्गी का दौरा समझ लेते हैं। लेकिन हर बार इसकी वजह मिर्गी नहीं होती।
150 किशोरों पर की गई रिसर्च
इस अध्ययन में 12 से 17 साल की उम्र के 150 किशोरों को शामिल किया गया। इनमें 75 ऐसे किशोर थे जिन्हें फंक्शनल यानी डिसोसिएटिव दौरे आते थे, जबकि 75 स्वस्थ किशोरों को तुलना के लिए शामिल किया गया। सीबीएमआर की एडवांस्ड फंक्शनल एमआरआई तकनीक से इनके मस्तिष्क का गहराई से अध्ययन किया गया।
रिसर्च में मस्तिष्क की बाहरी परत की मोटाई, उसकी तहों के पैटर्न और खांचों की गहराई जैसी चीजों को देखा गया। इसके बाद वैज्ञानिकों को भावना, तनाव, ध्यान और शरीर की गति नियंत्रित करने वाले हिस्सों में कुछ सूक्ष्म अंतर दिखाई दिए।
75 फीसदी किशोरों में मिला मानसिक आघात
रिसर्च की सबसे अहम बात यह रही कि फंक्शनल दौरे वाले 75 में से 56 किशोरों यानी करीब 75 फीसदी में बचपन के मानसिक आघात का इतिहास मिला। वहीं स्वस्थ समूह में केवल नौ किशोरों में ऐसा इतिहास सामने आया।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन बच्चों में तनाव, चिंता और डिप्रेशन का स्तर भी अधिक पाया गया। मानसिक आघात केवल किसी बड़ी घटना से नहीं, बल्कि लगातार तनावपूर्ण माहौल, भावनात्मक दबाव या सामाजिक परिस्थितियों से भी जुड़ा हो सकता है।
घरेलू झगड़े से लेकर स्कूल का दबाव तक
बच्चों पर घर का माहौल काफी गहरा असर डाल सकता है। परिवार में लगातार झगड़ा या हिंसा, माता-पिता से जुड़ा तनाव, किसी करीबी की मौत या अलगाव, स्कूल में उत्पीड़न और लगातार डांट-फटकार जैसी परिस्थितियां बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।
ऐसे में शरीर कभी-कभी तनाव की प्रतिक्रिया के रूप में ऐसे लक्षण दिखा सकता है जो देखने में मिर्गी के दौरे जैसे लगते हैं।
मिर्गी से अलग है इसका इलाज
विशेषज्ञों के अनुसार फंक्शनल दौरे मिर्गी की तरह दिमाग में असामान्य विद्युत गतिविधि के कारण नहीं होते। सामान्य जांच में भी इनके पीछे मौजूद सूक्ष्म बदलाव आसानी से पकड़ में नहीं आते। इसलिए हर ऐसे मामले को केवल मिर्गी मानकर इलाज करना सही नहीं है।
इन मामलों में बच्चे की मानसिक स्थिति को समझना और जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक से इलाज व काउंसलिंग कराना जरूरी हो सकता है। रिसर्च से परिवारों को यह समझने में भी मदद मिलेगी कि बच्चा जानबूझकर नाटक नहीं कर रहा है, बल्कि उसे वास्तविक परेशानी हो सकती है।
माता-पिता के लिए जरूरी संदेश
अगर बच्चे को बार-बार ऐसे झटके आते हैं, तो घबराने के बजाय डॉक्टर से उचित जांच करानी चाहिए। साथ ही घर के माहौल, बच्चे के तनाव और उसके भावनात्मक व्यवहार पर भी ध्यान देना जरूरी है। समय पर सही पहचान और उपचार से बच्चे को बेहतर मदद मिल सकती है।

