Bollywood News: हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में कई ऐसे गाने बने, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन्हीं कालजयी गीतों में एक नाम है ‘खोया-खोया चांद, खुला आसमान’। साल 1960 में रिलीज हुई फिल्म ‘काला बाजार’ का यह गीत आज भी रेडियो, म्यूजिक ऐप्स और स्टेज शो की शान बना हुआ है। मोहम्मद रफी की जादुई आवाज, देव आनंद की शानदार अदाकारी और वहीदा रहमान की सादगी ने इस गाने को हमेशा के लिए यादगार बना दिया।
जब गीत लिखना बन गया बड़ी चुनौती
इस गीत की धुन संगीतकार एस.डी. बर्मन पहले ही तैयार कर चुके थे। लेकिन इसके बोल लिखना आसान नहीं था। निर्माता देव आनंद चाहते थे कि गीतकार शैलेंद्र ही इसे लिखें। उस समय शैलेंद्र कई दूसरे प्रोजेक्ट्स में व्यस्त थे, इसलिए गीत आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
तब एस.डी. बर्मन ने अपने बेटे आर.डी. बर्मन को जिम्मेदारी दी कि वे शैलेंद्र के साथ बैठकर गीत पूरा करवाएं। पंचम दा भी पूरे उत्साह के साथ उनके पास पहुंचे, लेकिन काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी कोई सही शुरुआत नहीं मिल सकी।
जुहू बीच पर मिली गीत की पहली पंक्ति
काफी सोच-विचार के बाद शैलेंद्र और आर.डी. बर्मन रात में जुहू बीच पहुंच गए। समंदर की लहरें, खुला आसमान और चांदनी रात का खूबसूरत नजारा उनके सामने था। इसी दौरान शैलेंद्र लगातार सिगरेट पीते हुए धुन पर सोच रहे थे।
जब माचिस खत्म हो गई तो उन्होंने पंचम दा से माचिस मांगी और धुन फिर से सुनाने को कहा। जैसे ही धुन दोबारा गुनगुनाई गई, शैलेंद्र की नजर आसमान में चमकते चांद पर पड़ी और अचानक उनके दिमाग में पहली पंक्ति आई”खोया-खोया चांद, खुला आसमान”कहा जाता है कि उसी समय शुरुआती नोट्स माचिस की डिब्बी और पास रखे सिगरेट के पैकेट पर लिख लिए गए। यही पल इस ऐतिहासिक गीत की शुरुआत बन गया।
मोहम्मद रफी की आवाज ने बना दिया अमर
अगले दिन शैलेंद्र ने पूरा गीत तैयार किया। एस.डी. बर्मन ने इसे अंतिम रूप दिया और मोहम्मद रफी ने अपनी सुरीली आवाज से इसमें जान डाल दी। जब यह गीत देव आनंद और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया तो दर्शकों ने इसे दिल से अपनाया।
आज भी बरकरार है इस गीत का जादू
करीब 65 साल बाद भी ‘खोया-खोया चांद’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि हिंदी फिल्म संगीत की विरासत माना जाता है। इसकी मधुर धुन, शानदार बोल और भावनाओं से भरी प्रस्तुति नई पीढ़ी को भी उतनी ही पसंद आती है। यह गीत साबित करता है कि सच्ची कला समय की सीमाओं से कहीं आगे निकल जाती है।

