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रविवार, अगस्त 30, 2026
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Uttarakhand High Court: शराब की गंध से नहीं साबित होगा नशे में ड्राइविंग, इस राज्य में हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

Uttarakhand High Court: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नशे में वाहन चलाने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी चालक के मुंह से शराब की गंध आने मात्र से यह साबित नहीं होता कि वह नशे की हालत में वाहन चला रहा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में वैज्ञानिक जांच अनिवार्य है।

ब्लड या ब्रेथ टेस्ट जरूरी

जस्टिस आलोक मेहरा की एकल पीठ ने कहा कि यह साबित करने के लिए ब्लड टेस्ट या ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट आवश्यक है कि चालक के शरीर में शराब की मात्रा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 185 में निर्धारित सीमा से अधिक थी। अदालत ने कहा कि केवल शराब की गंध के आधार पर नशे में वाहन चलाने का आरोप या भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 के तहत आरोप तय नहीं किए जा सकते।

क्या था मामला?

मामला बदरीनाथ धाम से चमोली जा रही एक जीप दुर्घटना से जुड़ा है। याचिकाकर्ता अमर सिंह वाहन चला रहा था। आरोप है कि वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया, जिससे कई यात्री घायल हुए और एक यात्री की मौत हो गई।

दुर्घटना के बाद मेडिकल जांच में डॉक्टर ने चालक के मुंह से शराब की गंध आने का उल्लेख किया था। हालांकि, न तो उसका ब्लड सैंपल लिया गया और न ही ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट कराया गया।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 के अनुसार किसी व्यक्ति को तभी नशे में वाहन चलाने वाला माना जा सकता है, जब वैज्ञानिक जांच से यह साबित हो कि उसके 100 मिलीलीटर रक्त में 30 मिलीग्राम से अधिक अल्कोहल मौजूद थी। केवल गंध के आधार पर कानूनी कार्रवाई उचित नहीं है।

कोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य के अभाव में केवल शराब की गंध के आधार पर नशे में वाहन चलाने का आरोप टिक नहीं सकता। अदालत की इस टिप्पणी को भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

 

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