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सोमवार, जुलाई 6, 2026
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क्या आपने कभी सोचा है पुराने कपड़ों का क्या होता है? इसके पीछे छिपा है करोड़ों का कारोबार,जानिए पूरा सच

Old Clothes Recycling: भारत के लगभग हर शहर, कस्बे और गांव में आपने ऐसी महिलाओं को जरूर देखा होगा जो गली-गली घूमकर पुराने कपड़ों के बदले स्टील के बर्तन या घरेलू सामान देती हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके घर से निकलने के बाद उन कपड़ों का आखिर क्या होता है?असल में, इन कपड़ों के पीछे एक बड़ा सेकेंड हैंड और रीसाइक्लिंग नेटवर्क काम करता है, जो लाखों लोगों की आजीविका का हिस्सा है।

सबसे पहले होती है कपड़ों की छंटाई

घर-घर से कपड़े इकट्ठा करने वाली महिलाएं इन्हें ज्यादा समय तक अपने पास नहीं रखतीं। वे इन्हें थोक व्यापारियों या बड़े गोदामों में बेच देती हैं। यहां कपड़ों की गुणवत्ता के अनुसार उनकी छंटाई की जाती है।अच्छी हालत वाले कपड़े अलग रखे जाते हैं, हल्के खराब कपड़ों को दूसरी श्रेणी में रखा जाता है, जबकि पूरी तरह फटे या घिसे कपड़ों को रीसाइक्लिंग के लिए भेज दिया जाता है।

अच्छे कपड़े पहुंचते हैं सेकेंड हैंड बाजार

जो कपड़े अभी भी पहनने लायक होते हैं, उन्हें साफ करके और जरूरत पड़ने पर मामूली मरम्मत के बाद सेकेंड हैंड बाजारों में बेच दिया जाता है।कम आय वाले परिवार, छात्र, मजदूर और जरूरतमंद लोग कम कीमत में अच्छे कपड़े खरीद लेते हैं। इस तरह एक ही कपड़ा कई लोगों के काम आ जाता है और कपड़ों की बर्बादी भी कम होती है।

खराब कपड़ों से बनते हैं नए उत्पाद

जो कपड़े पहनने योग्य नहीं बचते, उन्हें रीसाइक्लिंग यूनिट में भेजा जाता है। वहां मशीनों की मदद से उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर फाइबर निकाले जाते हैं। इन्हीं फाइबर से दोबारा धागा तैयार किया जाता है।बाद में इन धागों का इस्तेमाल दरी, कालीन, कंबल, पोछा, कुशन, गद्दों की भराई और कई औद्योगिक उत्पाद बनाने में किया जाता है।

हर कपड़े की रीसाइक्लिंग आसान नहीं

कॉटन, ऊन और दूसरे प्राकृतिक रेशों वाले कपड़ों की रीसाइक्लिंग अपेक्षाकृत आसान होती है। वहीं पॉलिएस्टर, नायलॉन और मिक्स फैब्रिक वाले कपड़ों को अलग तकनीक और आधुनिक मशीनों से प्रोसेस करना पड़ता है।इसी वजह से टेक्सटाइल उद्योग लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहा है, ताकि ज्यादा से ज्यादा कपड़ों को दोबारा उपयोग में लाया जा सके।

पर्यावरण को भी मिलता है बड़ा फायदा

हर साल बड़ी मात्रा में कपड़े कचरे के रूप में लैंडफिल में पहुंच जाते हैं। यदि इन्हें रीसाइक्लिंग के जरिए दोबारा इस्तेमाल किया जाए तो नए कपड़े बनाने में कम पानी, कम ऊर्जा और कम कच्चे माल की जरूरत पड़ती है।इससे कार्बन उत्सर्जन घटता है, प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी कम होता है।

लाखों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया

पुराने कपड़ों का यह कारोबार सिर्फ बर्तन बदलने तक सीमित नहीं है। इसमें कपड़े इकट्ठा करने वाले लोग, थोक व्यापारी, छंटाई करने वाले कर्मचारी, सेकेंड हैंड बाजार के दुकानदार, रीसाइक्लिंग फैक्ट्री और छोटे उद्योग सभी जुड़े होते हैं।यानी जब आप पुराने कपड़ों के बदले बर्तन लेते हैं, तो आपके कपड़े खत्म नहीं होते बल्कि नई जिंदगी पाकर किसी न किसी रूप में फिर से लोगों के काम आते हैं। यही वजह है कि आज पुराने कपड़ों की रीसाइक्लिंग को टिकाऊ जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम माना जाता है।

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